Sunday, August 20, 2017

सौ बात की एक बात- क्षमा

श्याम एक सात्विक व्यक्ति था। उसने अपने मित्र मोहन को व्यापार करने के लिए एक लाख रूपये दिए। उन रूपयों से मोहन का व्यापार बहुत अच्छा जम गया लेकिन उसने रूपये अपने मित्र को नहीं लौटाये। आखिर दोनों में झगड़ा हो गया। झगड़ा इस सीमा तक बढ़ गया कि दोनों का एक दूसरे के यहाँ आना-जाना बिल्कुल बंद हो गया। घृणा व द्वेष का आंतरिक संबंध अत्यंत गहरा हो गया। श्याम हर समय सभी के सामने अपने मित्र मोहन की निंदा, निरादर व आलोचना करने लगा। उसका मन विचलित रहने लगा। भजन-पूजन के समय भी उसके चिंतन में अपना मित्र ही रहने लगा। मानसिक व्यथा का प्रभाव तन पर भी पड़ने लगा। बेचैनी बढ़ गयी। समाधान नहीं मिल रहा था। आखिर वह एक संत के पास गया और अपनी व्यथा कह सुनायी।
संत श्री ने कहाः 'बेटा ! तू चिंता मत कर। ईश्वरकृपा से सब ठीक हो जायेगा। तुम कुछ फल व मिठाइयाँ लेकर अपने मित्र के यहाँ जाना और मिलते ही उससे केवल इतना कहना, मित्र ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा कर दो।'
श्याम ने कहाः "महाराज ! मैंने ही उसकी मदद की है और क्षमा भी मैं ही माँगू !"
संत श्री ने उत्तर दियाः "मित्रता में ऐसा कोई भी संघर्ष नहीं हो सकता, जिसमें दोनों पक्षों की गलती न हो। चाहे एक पक्ष की भूल एक प्रतिशत हो दूसरे पक्ष की निन्यानवे प्रतिशत, पर भूल दोनों तरफ से होगी।"
श्याम की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उसने कहाः "महाराज ! मुझसे क्या भूल हुई ?"
"बेटा ! तुमने मन ही मन अपने मित्र को बुरा समझा – यह है तुम्हारी भूल। तुमने उसकी निंदा, आलोचना व तिरस्कार किया – यह है तुम्हारी दूसरी भूल। क्रोध पूर्ण आँखों से उसके दोषों को देखा – यह है तुम्हारी तीसरी भूल। अपने कानों से उसकी निंदा सुनी – यह है तुम्हारी चौथी भूल। तुम्हारे हृदय में मित्र के प्रति क्रोध व घृणा है – यह है तुम्हारी आखिरी भूल। अपनी इन भूलों से तुमने अपने मित्र को दुःख दिया है। तुम्हारा दिया दुःख ही कई गुना हो तुम्हारे पास लौटा है। जाओ, अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगो। नहीं तो तुम न चैन से जी सकोगे, न चैन से मर सकोगे। क्षमा माँगना बहुत बड़ी साधना है।"
श्याम की आँखें खुल गयीं। संत श्री को प्रणाम करके वे मित्र के घर पहुँचे। सब लोग भोजन की तैयारी में थे। उन्होंने दरवाजा खटखटाया। दरवाजा मित्र के बेटे ने खोला। सामने अंकल जी को देखकर वह अवाक् सा रह गया और खुशी से झूमकर जोर जोर से चिल्लाने लगाः "मम्मी ! पापा !! देखो तो अंकलजी आये हैं, अंकलजी आये हैं....।"
मित्र ने दरवाजे की तरफ देखा। सोचा, 'कहीं सपना तो नहीं देख रहा! पन्द्रह वर्ष के बाद आज मित्र घर आया है।' प्रेम से गला रूँध गया, कुछ बोल न सका। श्याम ने फल व मिठाइयाँ टेबल पर रखीं और दोनों हाथ जोड़कर मोहन से कहाः "मित्र ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा करो।"
"क्षमा" शब्द निकलते ही उनके हृदय का प्रेम अश्रु बनकर बहने लगा। मोहन उनके चरणों में गिर गया और अपनी भूल के लिए रो-रोकर क्षमा याचना करने लगा। क्षमा व प्रेम का अथाह सागर फूट पड़ा। सब शांत, चुप ! सबकी आँखों सके अविरल अश्रुधारा बहने लगी। मोहन उठा और रूपये लाकर श्याम के सामने रख दिये। श्याम कहने लगा "मित्र! आज मैं इन कौड़ियों को लेने के लिए नहीं आया हूँ। मैं अपनी भूल मिटाने, अपनी साधना को सजीव बनाने और द्वेष का नाश करके प्रेम की गंगा बहाने आया हूँ।
मेरा आना सफल हो गया, मेरा दुःख मिट गया। अब मुझे आनंद का एहसास हो रहा है।"
मोहन ने कहाः "मित्र! जब तक आप ये रूपये नहीं लोगे तब तक मेरे हृदय की तपन नहीं मिटेगी। कृपा करके ये रूपये ले लो।"
अंततः श्याम ने रूपये लिये और अपनी इच्छानुसार उसके बेटे-बेटियों में बाँट दिये। क्षमा माँगने के बाद श्याम और मोहन में वही पुरानी मित्रता सजीव हो उठी और उनके बीच व्याप्त तनावरूपी मानसिक रोग जड़ से ही मिट गये।