Tuesday, December 30, 2008

जरूरी है समय प्रबंधन

समय की कमी का रोना अधिकतर लोग रोते हैं, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि समय तो सभी के पास चौबीस घंटे का ही है, फिर कुछ लोगों का हर कार्य समय पर कैसे पूरा हो जाता है. वहीं कुछ लोग समय पर कार्य पूरा न होने के कारण हमेशा नर्वस रहते हैं, परेशान रहते हैं, टेंशन में रहते हैं. दरअसल इसकी मूल वजह यह है कि वे अपने समय का प्रबंधन ठीक ढ़ंग से नहीं कर पा रहे हैं. आइए समय प्रबंधन के बारे में हम कुछ चर्चा कर लें.
समझें समय का महत्व:
समय प्रबंधन का मतलब है- किसी कार्य को अपनी क्षमता के अनुसार निर्धारित समय के भीतर पूरा कर लेना, जिससे बिना बात के टेंशन एवं परेशानी से बचा जा सके. दरअसल हमारे अधिकतर कार्य इसलिए पूरे नहीं हो पाते, क्योंकि या तो हम उसका दायरा काफी फैला देते हैं या फिर कार्य को टालने की ऐसी आदत पाल लेते हैं, जिससे कार्य हमेशा अधर में लटका रहता है और हमारी टेंशन बढ़ जाती है.

तय करें प्राथमिकताएं:
हालांकि कुछ लोग ऐसा कहते हें कि वे अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद समय प्रबंधन नहीं कर पाते हैं. सच तो यह है कि उनके साथ ऐसा इसलिए होता हे क्योंकि उनकी प्राथमिकताएं सही नहीं होती हैं. वे यह समझ ही नहीं पाते कि किस कार्य को पहले करना है और किस कार्य को बाद में. यही नहीं, वे इस बात का आकलन भी ठीक से नहीं कर पाते कि एक दिन में उनको जितने कार्य निपटाने हैं, उसमें कितना समय खर्च होगा? क्या प्रत्येक कार्य के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा? दरअसल, लोग प्राय: अपनी क्षमता से ज्यादा कार्यों के लिए हामी भर देते हैं. लेकिन जब उन कार्यों के लिए समय नहीं निकाल पाते तो वे परेशान हो जाते है, टेंशन में आ जाते हैं.

मुश्किल नहीं समय प्रबंधन:
समय प्रबंधन कोई एक दिन में सीखने की चीज न होकर एक व्यवहारिक एप्रोच है। फिर भी, यदि हम कुछ बातों पर अमल करें तो समय को ठीक से प्रबंध कैसा किया जाए, सीख सकते हैं, अपने व्यवहार में ला सकते हैं. जैसे कि :-

  • अगले दिन कौन-कौन से कार्य निपटाने हैं, इसकी एक रूपरेखा रात को ही सोने से पहले बना लें। इससे न सिर्फ सुबह की हड़बड़ी से बचेंगे, बल्कि आपके सभी कार्य आसानी से निपट जाएंगे।
  • अपने कार्यों का कॉम्बिनेशन इस तरह बनाएं, जिससे कि आप उन्हें बिना किसी दबाव के खुशी-खुशी कर सकें।
  • काम को काम समझें बोझ नहीं। यदि कारणवश वह पूरा न हो पाए, बेवजह इमोशनल न हों। इससे आप दूसरे कार्यों को पूरी क्षमता के साथ नहीं कर पाएंगे.
  • काम का दायरा बेवजह न फैलाएं। एक काम को पूरा करने के पश्चात ही दूसरे काम को हाथ में लें.

तरीका परफेक्ट ग्रुमिंग का:
स्वयं को अच्छी तरह ग्रुम करने के लिए इन बातों को गांठ बांध लेना चाहिए :-

  • किसी भी कार्य को पूरी ईमानदारी एवं निष्ठापूर्वक मन लगाकर करें। बोझिल मन से नहीं।
  • कार्य को कभी बोझ न समझें, बल्कि पूजा की तरह भक्तिभाव से करें।
  • अपने अनुभवों से जो कुछ सीखा और समझा है, उस पर विश्वास करें।
  • अपनी क्षमताओं को समझें। आत्म-सम्मान की भावना विकसित करें.
  • प्यार की भाषा बोलें।
  • किसी के साथ ऐसा व्यवहार बिलकुल भी न करें, जैसा कि आप अपने लिए नहीं चाहतें हैं।
  • समझदारी और विश्वास का सही इस्तेमाल करना सीखें। किसी की बातों पर पूरी तरह भरोसा तो करें, लेकिन मन में एक प्रश्न-चिह्न भी रखें। इससे आप धोखा नहीं खाएंगे.
  • दुनिया में अच्छाई के साथ बुराई भी है, इसलिए परिस्थितियों से घबराएं नहीं। लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें।
  • हर समस्या के एक से ज्यादा समाधान हो सकते हैं, इसलिए अनुरूपता बिन्दु (Conflict point) से परे सोचें। संभव है समाधान वहीं कहीं छिपा हो.

बेहतर ढ़ंग से जिए जिंदगी

जिंदगी के प्रति हमारा जैसा नजरिया होगा, हम वैसी ही जिंदगी वयतीत करते हैं. सच तो यह है कि यदि आप सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं तो जीवन के उतार-चढ़ाव व सफलता-असफलता भी आपको विचलित नहीं कर सकती. सच तो यह है कि आशावादी नजरिया आपकी जिंदगी को खुशगवार बना देता है और निराशावादी विचार आपकी जिंदगी को नरक. यदि आप भी मेरी तरह अपनी जिंदगी खुशगवार रखना चाहते हैं तो इस बारे में मेरी टिप्स सिंर्फ आपके लिए है-
निराशा से मुक्त हों :
मन में निराशावादी विचार उठने पर खुद से यह तर्क करें कि क्या किसी समस्या के समाधान में इस तरह के विचार सहायक हो सकते हैं? इस सवाल के जबाव में निश्चित रूप से आपका अंतर्मन यही कहेगा- नहीं, कदापि नहीं. खुद के बारे में नकारात्मक विचारों से मुक्त होकर आशावादी रवैया अपनाएं.

प्रतिकूलता में भी सकारात्मक रवैया :
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सकारात्मक नजरिया अपनाएं. इस बारे में मैं अपना अनुभव आपसे शेयर करना चाहूंगा. एक बार जहां मैं काम करता हूं वहां मेरी नजर में कड़क और मेरे सहकर्मियों की नजर में जल्लाद अधिकारी की नियुक्ति हुई. वह काम के मामले में थोड़ा सख्त तथा समय की पाबंदी पसन्द अधिकारी था. सारा स्टाफ साथ में मैं भी उससे तंग आ गया था. सारा स्टाफ उसके बारे में नकारात्मक विचार रखता था और परेशान था, परन्तु मैंने उसके बारे में सकारात्मक विचार रखते हुए अपना काम करना जारी रखा. इससे वह अधिकारी मेरे काम से अन्दर ही अन्दर तो खुश था परन्तु स्वभाववश मेरे काम की आलोचना मेरे अन्य सहकर्मियों से करता था. मैंने इस प्रतिकूलता में भी अपना सकारात्मक रवैया अपनाए रखा और मस्त रहा. जबकि मेरे सहकर्मी जो कि नकारात्मक रवैया अपनाए हुए थे, परेशान रहते थे. मैं उनसे कहा करता था कि अपने काम और समय पालन का ध्यान रखो. कोई तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता. कुछ ने तो इसे अपनाया और अपने स्वभाववश न अपना सके और उस अधिकारी के स्थानान्तरण तक परेशान रहे.

वास्तविक लक्ष्य निर्धारण करें:
उन्हीं लक्ष्यों को आप निर्धारित करें, जिन्हें आप एक तयशुदा वक्त में पूरा कर सकते हैं. कई कार्यों को एक साथ करने की कोशिश बिलकुल भी न करें, वरना आप भी मेरी एक सहकर्मी की तरह परेशान हो जाएंगे. वह भी एक समय में कई-कई प्रोजेक्ट पर काम करने लगती है. नतीजा कोई भी प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं हो पाता और वह कुंठित हो जाती है. एक साथ कई काम हाथ में लेने से आप किसी भी कार्य को न्यायोचित ढ़ंग से पूरी ईमानदारी से नहीं कर पाएंगे. इसलिए प्रत्येक कार्य को निष्पादित करने के लिएलक्ष्य निर्धारित करना आवश्यक है. फुर्सत के क्षणों में अपने किसी शौक को पूरा करें. संगीत सुनें और अपनी पसंदीदा किताब पढ़ें, पर याद रखें कि नकारात्मक विचार वाले व्यक्तियों और वस्तुओं के बीच अपना कीमती वक्त बर्बाद बिलकुल भी न करें.

प्रेरणादायक घटनाएं दर्ज करें:
सुबह की शुरूआत सकारात्मक चिन्तन से करें. प्रतिदिन किसी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित किसी प्रेरणादायक घटना या लेख को एक डायरी में अवश्य दर्ज करें. इससे आपका पूरा दिन खुशगवार रहेगा और आपका मन भी प्रफुल्लित रहेगा.

सफलता की कामना करें:
मन में सदैव ही सफलता की कामना करें. याद रखें, सफलता का सबसे पहला विचार मन में ही पनपता है. फिर आप इस विचार को कार्यरूप में परिवर्तित करते हैं. सफलता की कामना भी आपको आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है.

कृतज्ञता को याद रखें:
जो लोग आपके व्यक्तित्व के विकास में सहायक रहें हैं या फिर परोक्ष-अपरोक्ष में मददगार रहे हैं या फिर जिन लोगों ने आपके संकट के समय में साथ दिया है, उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखें. ऐसे लोगों को किसी अवसर विशेष पर इस बात से जरूर अवगत कराएं कि आपके सहयोग के लिए मैं कितना शुक्रगुजार हूं. इसी तरह आप प्रकृति और अदृश्य सत्ता के प्रति भी अपना शुक्रगुजार होना प्रकट कर सकते हैं.

Friday, December 5, 2008

आतंकवाद से संघर्ष: भारतीय महाग्रंथों के संदर्भ में

आज आतंकवाद हमारे सामने सुरसा की तरह मुंह फैलाए खड़ा है. आज की सबसे ज्वलंत समस्या है- 'आतंकवाद'. इस समस्या से हम पौराणिक काल से जूझते आ रहे हैं और हर युग में कोई ना कोई आकर हमें इस गंभीर समस्या से निजात दिलाता आया है. त्रेतायुग में रावण के आतंक से राम ने जिस तरह मानव-जाति को राहत पहुंचाई, उसी तरह द्वापरयुग में जरासंध एवं कंस जैसे कई आततायियों को समाप्त करके इस समस्या का अंत किया. रामायण और महाभारत दोनों ही महाग्रंथ आतंकवाद से संघर्ष के रूप में निरूपित हैं.

त्रेतायुग में रावण का आतंकवाद चरम-सीमा पर था, आतंकियों की शाखाएं-प्रशाखाएं दक्षिण से पूरे उत्तर भारत तक फैली थी। खरदूषण, मारीचि, सुबाहु और ताड़का जैसे आतंकवादी उसके दल के स्वयंभू कमांडर थे. इन स्वयंभू कमांडरों के अधीन कार्यरत हजारों आतंकवादी मासूम जनता एवं साधु-संतों पर अकसर कहर ढ़ाते रहते थे. इन आतंकवादियों का समूल नाश करने के लिए अयोध्या के युवराज राम ने संकल्प लिया और उत्तर भारत में स्थित आतंकवादियों के छोटे-छोटे गढ़ों को ध्वस्त करते हुए अंतत: मास्टर-माइंड आतंकवादी रावण के गढ़ लंका पर धावा बोलकर उसके आतंक का समूल नाश किया।

उसी तरह महाभारत काल में जरासंध महाआतंकवादी था. उसने अनेक राज्यों के अधिपतियों को अपनी कारागार में डाल रखा था. उस महाआतंकवादी के सहयोगी शिशुपाल, शाल्य, दंतवक्र और कंस आदि थे. इनकी आतंकवादी गतिविधियों का अंत करने के लिए कृष्ण के मार्ग-निर्देशन में महाभारत की रचना रची गई. इसके अंतर्गत करूक्षेत्र के 18 दिन का भयंकर युध्द हुआ और महाआतंकी जरासंध सहित सभी आतंकियों नाश हुआ.

आज पूरा विश्व आतंक की समस्या से जूझ रहा है. इस आतंक से कैसे निजात पाया जाए, यह आज का महत्वपूर्ण प्रश्न है. यह तो सभी को मालूम है कि अंतत: बुराई का अंत होता है और अच्छाई की विजय होती है. भारतीय महाग्रंथों के संदर्भ में आतंकवाद से कैसे संघर्ष किया जा सकता है? इस विषय पर गहन अध्ययन करने वाले आठ महाकाव्यों के अनन्य व्याख्याकार महान साहित्यकार डा. नरेन्द्र कोहली एवं डा. प्रमोद कुमार सिंह को सुनने का मौका मिला. आतंकवाद से कैसे संघर्ष किया जा सकता है? इस पर उनके विचार आपके समझ प्रस्तुत है :-

आतंकवाद के संदर्भ में मगध विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डा. प्रमोद कुमार सिंह ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि आतंकवाद के अंधकार से लड़ने के लिए हमें अपनी जड़ों की ओर मुड़ना होगा. अपने महाग्रंथों का पुन: स्मरण करना अपेक्षित होगा. शबरी से मिलने के लिए राम और लक्ष्मण अग्रसर हैं, लक्ष्मण एक बगुले को देखते हैं, जो हौले-हौले चल रहा है. लक्ष्मण अपने भ्राता राम से इसका कारण पूछते हैं. राम कहते हैं- यह बगुला धीरे-धीरे इसलिए चल रहा है कि अपना भोजन करना है. लक्ष्मण राम के कथन से सहमत नहीं होते और कहते हैं कि यह बगुला परम धार्मिक है. वह तो इसलिए धीमे-धीमे चल रहा है, ताकि कोई प्राणी उसके पैर के नीचे दबकर मर न जाएं. राम में एक प्रशासक के गुण हैं, उनका यथार्थ को देखने का एक दृष्टिकोण है. लक्ष्मण भोले हैं वह देखते हैं कि बगुला जैसा एक हिंसक प्राणी अहिंसक हो गया है. परन्तु राम हकीकत से परिचित हैं, इसलिए कहते हैं-भूलो मत यह भीतर से बड़ा ही स्वार्थी और खौफनाक है. इतिहास के कथाओं, पुराख्यानों को पढ़कर प्राचीन वांग्मय की आलोचना/समालोचना करके हम अपनी जड़ों को समझ सकते हैं. अपनी समस्याओं का निदान पा सकते हैं. आतंकवाद से संघर्ष अनवरत चलता रहेगा और हम लोगों को लड़ते रहना है. ठीक वैसे ही जैसे अर्नेस्ट हैमिंग्वे का 'ओल्ड मैन सानतियागो' समुद्र से लड़कर शार्क व्हेल को लेकर नई पीढी के लोगों द्वारा लांछित होने के बावजूद जब लाता है तो नई पीढ़ी आंख में विस्मय भरकर उसके पराक्रम को सराहने लगती है. हैमिंग्वे कहता है 'मैन कैन बी डिस्ट्रॉएड बट कैननॉट बी डिफिटेड' व्यक्ति को बर्बाद किया जा सकता है पर पराजित नहीं किया जा सकता है. यही भारतीयता है. यहां तमस पर आलोक निरंतर भारी रहेगा.

प्रखर साहित्यकार डा. नरेन्द्र कोहली ने आतंकवाद से संघर्ष विषय पर एक अपने कालेज के दिनों की एक घटना का उल्लेख कहते हुए कहा कि जब मैं कॉलेज में पढ़ाता था, उस समय भूतपूर्व छात्रों के साथ एक कार्यक्रम की व्यवस्था में लगा हुआ था कि अचानक भगदड़ मची और सभी बाहर की ओर भागे. मैंने बाहर जाकर देखा तो करीब तीन साढ़े तीन सौ लड़कों की भीड़ के बीच एक लड़के ने दूसरे लड़के को चाकू से वार करके घायल कर दिया था. वे दोनों लड़के मेरे ही छात्र थे. मैंने जाकर उन दोनों लड़कों को डांटा कि यह क्या हो रहा है? वह छात्र, जिसका नाम खैराती लाल गांधी था और जो चाकू से मार रहा था, वहां से भाग गया और घायल लड़के को उसके कालेज के मित्र अस्पताल, थाना पुलिस कार्रवाई के लिए ले गये. भीड़ जब छटी तो मैंने देखा मेरे कमीज के आस्तीन पर खून लगा था. मैं सोचने लगा कि क्या हम जंगल में रहते हैं? कोई प्रशासन नहीं क्या? कोई व्यवस्था नहीं है? अभी तक कोई पुलिस क्यों नहीं आयी? जिस किसी ने इस घटना के बारे में सुना, उसने ही मुझे डांटा कि क्या जरूरत थी बीच में पड़ने की. वह एक चाकू तुम्हारे पेट में भी घुसेड़ देता तो सारी अक्ल ठिकाने आ जाती. कुछ दिनों तक मैं भी घबराए हुए था कि पुलिस आकर मुझसे पूछताछ करेगी और सच कहने पर वे लड़के मुझे छोड़ेंगे नहीं. मगर पुलिस नहीं आयी. इसका पता उन्हीं लड़कों से पूछने पर चला कि चाकू मारने वाले ने सुबह ही पुलिस को पैसे दे दिए थे और कहा कि इधर आना नहीं. ऐसे में लोगों का यह सोचना कि पुलिस है, प्रशासन है, हम बहुत सुरक्षित हैं, सब यहीं समाप्त हो जाता है. कैसे एक लड़के के चाकू मारने की एक घटना काफी है पूरी व्यवस्था को ठप करने के लिए, पारालाइस्ड करने के लिए. मैं सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि मेरे जैसा कमजोर और डरपोक अध्यापक इस व्यवस्था को ठीक करने के लिए क्या कर सकता है.

तब मेरा ध्यान गया विश्वामित्र के यज्ञ में राक्षस रक्त और मांस का क्या खेल खेलते थे. एक आश्रम है, ऋषि वहां पढ़ा रहे हैं, ज्ञान का कुछ आयोजन करते हैं, गुरू हैं, शिष्य हैं, बस किसी को मार डालो, यज्ञ में हड्डी डाल दो. मतलब किसी एक घटना जैसे मुहल्ले में यदि हत्या हो जाए, गोली चल जाए तो लोग इतने आतंकित हो जाते हैं कि उसके खिलाफ बोलने का साहस नहीं जुटा पाते हैं. विश्वामित्र ने जब राक्षसी आतंक का नाश करने के लिए दशरथ से जब राम को मांगा तो दशरथ पुत्र मोह में आकर अपनी चतुरंगनी सेना देने को कहा विश्वामित्र इससे इंकार कर दिया क्योंकि यदि सेना से ही आतंक का नाश होना था तो राजा दशरथ ही उसे समाप्त कर देते. विश्वामित्र ने दशरथ से राम को दस दिनों के लिए मांगा और सुरक्षित वापस करने का भी आश्वासन दिया इससे पता चलता है कि विश्वामित्र खुद अपनी रक्षा और राम की रक्षा करने में समर्थ थे वह तो राम को राक्षसी आतंक दिखाना चाहते थे और लोगों के मन से राम के माध्यम से इस भय को दूर करना चाहते थे. जैसा कि महात्मा गांधी ने अंग्रेजों का आतंक लोगों के मन से दूर किया, जिस अंग्रेज पुलिस के डर से लोग भाग जाते थे, छिप जाते थे, उन्हीं अंग्रेजों के जेल को लोगों से भर दिया. यहां तक लोग इतने भय मुक्त हो गये थे कि अंग्रेजों को कहते थे कि किस थाने में चलना है चल.

जब राम ने यह दृश्य देखा तो वे योजना बनाने लगे कि इससे कैसे निपटना है? आतंकवादियों को धन, शस्त्र और संरक्षण देने का काम कौन कर रहा है? राम वनगमन भी इसीलिए करते हैं कि वो जनता को जगाना चाहते हैं कि कैसे इस राक्षसी आतंक से निपटना है. रास्ते में आगे बढ़ते हैं तो उन्हें छोटे-मोटे राक्षस (आतंकवादी) मिलते हैं जो पिछड़ी दलित-दमित जातियों को सता रहे हैं. आतंकवादी अराजकता फैलाना चाहते हैं ताकि वह अपनी बात मनवा सकें. राम जब सरभंग ऋषि के आश्रम में जाते हैं तो हड्डियों का ढेर देखते हैं तो वे सोचते हैं कि राक्षस ऋषियों के मांस क्यों खाएंगे. उनके मांस तो इतने स्वादिष्ट भी नहीं थे, तपस्या से केवल हड्डी ही बची थी, तो इसके पीछे क्या कारण है? मेरी समझ के अनुसार शायद राक्षस बौध्दिक नेतृत्व को समाप्त करना चाहते हैं. ऋषि बुध्दिजीवी थे, वह आवाज उठाएंगे, दलित-दमित जातियों को शिक्षा देगें, उनको आगे बढ़ाएंगे जैसे कि अगस्त ऋषि समुद्र परिचालन की शिक्षा दे रहे थे, तमिल का व्याकरण लिख रहे थे. विंध्याचल के उत्तर-दक्षिण को मिला रहे थे ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जिनसे राक्षसों के मार्ग में ये ऋषि बाधक थे. राक्षस उन्हें डराने के लिए उनके समक्ष हड्डियां डाल देते थे कि हमारा कहना नहीं मानोगे तो तुम्हारा भी अंजाम यही होगा. यही तो आतंकवाद है. आतंकवाद वह है जो व्यक्ति को डरा देता है, इतना असहाय बना देता है कि वह कीड़े-मकोड़े के समान हो जाता है. कम्ब के रामायण में इन्द्र को राक्षसों का संक्षरणदाता एवं मौन समर्थक कहा गया है. क्योंकि अगर इन्द्र ऋषियों के साथ थे, तब वहां राम के होने कि क्या आवश्यकता थी. इन्द्र ही राक्षसों का अंत कर देते. यहां इन्द्र की तुलना अमेरिका जैसे महाशक्ति से है. अमेरिका भी आतंकवाद के मूल स्रोत पाकिस्तान का संरक्षणदाता है. भारत सरकार द्वारा जब यह कहा जाता है कि कि लाइन ऑफ कन्ट्रोल के पार आतंकवादी शिविर हैं वहां जाकर उन्हें खत्म करेंगे तो अमेरिका भारत का हाथ पकड़ लेता है कि तुम लाइन ऑफ कन्ट्रोल पार नहीं करोगे. आतंकवादी गतिविधि चलाने के लिए हथियार, धन, सर पर हाथ होने की आवश्यकता होती है, लेकिन रामायण में राम उसी समय प्रतिज्ञा करते हैं कि उनके (राक्षसों) साथ कोई मीटिंग नहीं, कोई संधि नहीं, कोई सोच-विचार नहीं, कोई रियायत नहीं। यहाँ भारत सरकार के दुर्बल हृदय बात है कि किस तरह कश्मीर में आतंकवादियों को मस्जिद में बिरयानी खिलाया गया और उन्हें सुरक्षित रास्ता पाकिस्तान जाने के लिए दिया. किस तरह दिल्ली की सरकार संसद पर हमला करने वाले मास्टर माइंड अफजल को बचाने की कोशिश कर रही है. पर राम को किसी का भय नहीं. न इन्द्र का और न रावण का.


गीता में कृष्ण ने अर्जुन को कहा जो शत्रु है उसे शत्रु मान और उसका एक ही उत्तर है शत्रु का दमन. दुष्ट दलन उस रूप में राम यह प्रतिज्ञा करते हैं और जहां भी राक्षस मिल जाते है उनको मारते हैं. एक ऋषि के आश्रम में जब राम रूकने की बात कही तो ऋषि ने कहा मेरा आश्रम बहुत अच्छा है पर वहां उपद्रवी मृग आते हैं. इससे पता चलता है कि कुछ बुध्दिजीवी जानते सब कुछ हैं पर उसका विरोध करने का साहस उनमें नहीं है और कुछ बुध्दिजीवी बिके हुए है. अंत में राम अगस्त ऋषि के पास जाते हैं जो बुध्दिजीवी भी हैं और योध्दा भी. अगस्त ऋषि पहले से हीे राक्षसों से लड़ रहे थे. राम को गोदावरी के तट पर भेजते हैं, जहां खर-दूषण,शूर्पणखा आदि जैसे आतंकवादियों का स्कंधावर (गढ़) है. वहां जाओ ताकि वहां जो जड़ है उसे उखाड़ फेकों तो आतंकवाद ऐसी चीज नहीं है कि एक-दो आतंकवादी को मार दिया तो वह समाप्त हो गया, उसे प्राण देने वाली जो शक्ति है उसे समाप्त करना आवश्यक है. रावण ही महाआतंकवादी है यह राम जान गए थे. उसको परास्त करने एवं उसका समूल नाश करने के लिए वे आमजन का सहयोग लेते हैं. रावण से युध्द करने के लिए लक्ष्मण, सुग्रीव, जामवंत, हनुमान के साथ पंचायत करते हैं कि किस तरह युध्द किया जाए, जिसमें सभी क ा सम्मान, सुरक्षा, सम्पति का आदि का ख्याल रखा जाए. राम ने आम जन के सहयोग से ही महा आतंकी रावण का समूल नाश किया.
महाभारत काल में भी कई आतंकवादी थे जिनमें एक बकासुर था, जो कहता था हर दिन खाने को एक आदमी चाहिए नहीं तो सबको को मार डालूंगा. तक्षक भी एक आतंकवादी था, जिसका काम ही था इसको-उसको डसना. आज के संदर्भ में तक्षक का काम नक्सलवादी, माओवादी आदि आदि कर हैं. जब कृष्ण-अर्जुन तक्षक को ढूंढते हुए उसके समीप पहुँचे. पता चला तक्षक तो वहां है ही नहीं, उसे इन्द्र ने खण्डप्रस्थ के पड़ोस में छिपा कर रखा है. इस दौरान इन्द्र तक्षक के बेटे को वहां से बचा कर ले जाता है. हैं जिस तरह अमेरिकी जरनल के सामने से पाकिस्तान ने अपने सैनिकों को तालिबान से एयर लिफ्ट किया. इसी तरह आतंकवादियों की एक मंडली थी जिसका सरगना जरासंध था. इसकी मंडली में कंस जैसे आतंकी भी थे. पांडव जब वन गमन कर रहे थे तो दुर्योधन उनके सामने अपने वैभव का प्रदर्शन करने गया था, जहां उसका गन्धर्वों के साथ युध्द हुआ और गन्धवों के राजा चित्रसेन ने उसे पकड़ लिया. कर्ण पहले से ही वहां से भाग चुका था. तब अर्जुन ने दुर्योधन को चित्रसेन से मुक्त कराया. इस बात पर दुर्योधन ने इसे अपना अपमान समझा और उसे काफी कष्ट हुआ. वह अन्न-जल त्याग कर बैठ गया और प्राण देने का हट करने लगा. जब सभी दैत्य शक्ति एकत्र होकर उससे कहती है कि हम सभी तेरे साथ हैं. तू पाण्डवों से युध्द कर. भौमासुर की आत्मा कर्ण में समा जाती है वास्तव में यह सब कृष्ण की योजना का अंग था. उनका यहां उद्देश्य था कि सभी आसुरी शक्तियों को एक साथ एकत्र कर लिया जाए, ताकि अधर्म का नाश हो सके. जब युध्द भूमि में अर्जुन विचलित होकर यह कहते हैं कि वे अपने गुरूजनों के रक्त से भीगा हुआ साम्राज्य नहीं चाहते हैं. इस पर कृष्ण उन्हें यह समझाते हैं कि वे धर्म के लिए युध्द कर रहे हैं. अर्जुन का कहना था कि अपने लोगों की हत्या करने से अच्छा है, भिक्षा मांग कर जीवनयापन करना. इस पर कृष्ण उनका साथ नहीं देते हैं, बल्कि उन्हें गाण्डवी उठाने के लिए प्रेरित करते हैं और धर्म की स्थापना हेतु युध्द करने के लिए कहते हैं. कृष्ण, अर्जुन को यह समझाते हैं कि संन्यास की ओर न जाकर कर्म के लिए युध्द करो. यही गीता का उद्देश्य है. कर्म करो, फल की चिन्ता न करो.

आतंकवाद की समस्या से लड़ने के लिए सबसे आवश्यक है - दृढ़संकल्प. संकल्प के अभाव के कारण ही आतंकवाद की समस्या इतनी बढ़ चुकी है. यह आवश्यक है कि राजा नहीं करता तो प्रजा करे, प्रजा को लड़ना पड़ेगा. हमारे धार्मिक ग्रंथों में यही कहा गया. धर्म की स्थापना के लिए आवश्यक है - दृढ़ राजनीतिक संकल्प. जिसकी आज हमारे देश को आवश्यकता है.

Wednesday, November 26, 2008

विवाह का स्वरूप

विवाह का स्वरूप आज विवाह वासना-प्रधान बनते चले जा रहे हैं । रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नी के चुनाव में प्रधानता दी जाने लगी है, यह प्रवृत्ति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है । यदि लोग इसी तरह सोचते रहे, तो दाम्पत्य-जीवन शरीर प्रधान रहने से एक प्रकार के वैध-व्यभिचार का ही रूप धारण कर लेगा । पाश्चात्य देशों जैसी स्थिति भारत में भी आ जायेगी । शारीरिक आकर्षण की न्यूनाधिकता का अवसर सामने आने पर विवाह जल्दी-जल्दी टूटते-बनते रहेंगे । अभी पत्नी का चुनाव शारीरिक आकर्षणको ध्यान में रखकर किए जाने की प्रथा चली है, परन्तु अब इसकी प्रतिक्रियामें पति के चुनाव की प्रथा भीसामने आ गई है ।अब असुन्दर पतियों को कोई पत्नी नही कर रहीं हैं और उन्हें दाम्पत्य सुख से वंचित ही रहना पड़ रहा है। समय रहते इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए और शारीरिक आकर्षण उपेक्षा कर सद्गुणों तथा सद्भावनाओं को ही विवाह का आधार पूर्वकाल की तरह बने रहने देना चाहिए । शरीर का नहीं आत्मा का सौन्दर्य देखा जाए और साथी में जो कमी है, उसे प्रेम, सहिष्णुता, आत्मीयता एवं विश्वास की छाया में जितना सम्भव हो सके, सुधारना चाहिए, जो सुधारन हो सके, उसे बिना असन्तोष लाये सहन करना चाहिए । इस रीति-नीति पर दाम्पत्य जीवन की सफलता निर्भर है । अतएव पति-पत्नीको एक-दूसरे से आकर्षण का लाभ मिलने की बात न सोचकर एक-दूसरे के प्रति आत्म-समर्पणकरने और सम्मिलित शक्ति उत्पन्न करने, उसके जीवन विकास की संभावनाएंउत्पन्न करने की बात सोचनी चाहिए । चुनाव करते समय तक साथी को पसन्द करने न करने की छूट है । जो कुछ देखना, ढूँढ़ना, परखना हो, वह कार्य विवाह से पूर्व ही समाप्त कर लेना चाहिए । जब विवाह हो गया, तो फिर यह कहने की गुंजाइश नहीं रहती कि भूल हो गई, इसलिए साथी की उपेक्षा की जाए । जिस प्रकार के भी गुण-दोष युक्त साथी के साथ विवाह बन्धन में बँधें, उसे अपनी ओर से कर्त्तव्यपालन समझकर पूरा करना ही एक मात्र मार्ग रह जाता है । इसी के लिए विवाह संस्कार का आयोजन किया जाता है । समाज के संभ्रांत व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-संबंधियोंकी, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कर्तव्य-बन्धन की उपेक्षा करे, तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें । पति-पत्नी इन संभ्रांत व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा करते हैं । यह प्रतिज्ञा समारोह ही विवाह संस्कार है । इस अवसर पर दोनों की ही यह भावनाएँ गहराई तक अपने मन में जमानी चाहिए कि वे पृथक् व्यक्तियों की सत्ता समाप्त कर एकीकरण की आत्मीयता में विकसित होते हैं । कोई किसी पर न तो हुकूमत जमायेगा और न अपने अधीन-वशवर्ती रखकर अपने लाभ या अहंकार की पूर्ति करना चाहेगा । वरन् वह करेगा, जिससे साथी को सुविधा मिलती हो । दोनों अपनी इच्छा आवश्यकता को गौण और साथी की आवश्यकता को मुख्य मानकर सेवा और सहायता का भाव रखेंगे, उदारता एवं सहिष्णुता बरतेंगे, तभी गृहस्थी का रथ ठीक तरह आगे बढ़ेगा । इस तथ्य को दोनों भली प्रकार हृदयंगम कर लें और इसी रीति-नीति को आजीवन अपनाये रहने का व्रत धारण करें, इसी प्रयोजन के लिए यह पुण्य-संस्कार आयोजित किया जाता है । इस बात को दोनों भली प्रकार समझ लें और सच्चे मन से स्वीकार कर लें, तो ही विवाह-बंधन में बँधें । विवाह संस्कार आरम्भ करने से पूर्व या विवाह वेदी पर बिठाकर दोनों को यह तथ्य भली प्रकार समझा दिया जाए और उनकी सहमति माँगी जाए । यदि दोनों इन आदर्शों को अपनाये रहने की हार्दिक सहमति-स्वीकृति दें, तो ही विवाह संस्कार आगे बढ़ाया जाए ।

Thursday, November 20, 2008

शादी आत्मा की प्रकृति का मिलान है

प्रकृति पुरुष और स्त्री को पैदा करती है,जाति,शरीर की बनावट,शिक्षा,खानपान,व्यवहार,समाज और रहने वाला स्थान भाग्य पैदा करता है,भाग्य ही स्त्री और पुरुष दोनो को मिलाते है,पुरुष की कुन्डली में शुक्र और स्त्री की कुन्डली के लिये मंगल का प्रभा्व ध्यान में रखना बहुत ही जरूरी होता है,कभी कभी राहु का असर व्यक्ति के जीवन में भ्रान्तियां पैदा कर देता है,और भाग्य बनने के बावजूद भी दोनों की प्रकृति नही मिल पाती है,कितने ही मैरिज ब्यूरो देखे है,सुने है,उनका एक ही काम होता है,शिक्षा और उम्र को आपस में मिलाकर एक दूसरे का बायोडाटा भेजा करते है,तस्वीर और हकीकत में बहुत अन्तर होता है,तस्वीर को आजकल के कम्प्यूटर-चित्रण के द्वारा अच्छे से अच्छा बनाकर भेजा जा सकता है,सम्मोहन के द्वारा की गयी शादियों के प्रभाव के द्वारा ही अकेले भारत की अदालतों में करोडों केश अदालतों में विचाराधीन है,इन सबसे बचने का एक ही तरीका है कि शादी को शादी की तरह से समझा जाये,शादी को समझने के लिये स्त्री और पुरुष दोनों की आत्माओं को समझना जरूरी है,आत्मायें भी तीन प्रकार की होती है,पहली वैज्ञानिक आत्मा है, जो हर बात को प्रत्यक्ष देखना चाहती है,और केवल शादी को संभोग की द्रिष्टि से देखती है,उसे पूजा पाठ धर्म कर्म से कुछ लेना देना नही होता है,खाना पीना और ऐश करना उन आत्माओं वैचारिक भाव होता है,दूसरी महान आत्मायें हुआ करती है,उनका काम किसी भी स्थिति में रहकर केवल अपने द्वारा जन-कल्याण की भावना और पारिवारिक सुख शांति को बनाकर रखना होता है,पिता को पिता और माता को माता,तथा अलावा पारिवारिक लोगों को अपना हितैषी मानकर ही वे अपने जीवन को चलाना चाहते है,उनके लिये धर्म अर्थ काम और मोक्ष का प्रभाव समानान्तर रूप से होना अधिक फ़लदायी होता है,और इसके बिना अगर उनको अलावा किसी आत्मा के साथ किसी प्रकार के सामयिक बदलाव या कारण के द्वारा जोडा जाता है,तो या तो वे अपने जीवन को किसी भी कारण से समाप्त कर लेतीं है,या फ़िर वे अलग रहकर बाकी का जीवन किसी भी तरह से गुजारकर दूसरे जन्म की आशा करती है,तीसरी आत्मा भूतात्मा होती है,जो अपने किसी न किसी प्रकार के पिछले कर्मों का फ़ल भुगतवाने के लिये साथ जुडती है,और जैसे ही उनका कार्य पूरा होता है,वे किसी न किसी बहाने से जीवन के सफ़र में अपने जीवन साथी को अकेला छोडकर किनारा कर लेती है।