Thursday, November 20, 2008

शादी आत्मा की प्रकृति का मिलान है

प्रकृति पुरुष और स्त्री को पैदा करती है,जाति,शरीर की बनावट,शिक्षा,खानपान,व्यवहार,समाज और रहने वाला स्थान भाग्य पैदा करता है,भाग्य ही स्त्री और पुरुष दोनो को मिलाते है,पुरुष की कुन्डली में शुक्र और स्त्री की कुन्डली के लिये मंगल का प्रभा्व ध्यान में रखना बहुत ही जरूरी होता है,कभी कभी राहु का असर व्यक्ति के जीवन में भ्रान्तियां पैदा कर देता है,और भाग्य बनने के बावजूद भी दोनों की प्रकृति नही मिल पाती है,कितने ही मैरिज ब्यूरो देखे है,सुने है,उनका एक ही काम होता है,शिक्षा और उम्र को आपस में मिलाकर एक दूसरे का बायोडाटा भेजा करते है,तस्वीर और हकीकत में बहुत अन्तर होता है,तस्वीर को आजकल के कम्प्यूटर-चित्रण के द्वारा अच्छे से अच्छा बनाकर भेजा जा सकता है,सम्मोहन के द्वारा की गयी शादियों के प्रभाव के द्वारा ही अकेले भारत की अदालतों में करोडों केश अदालतों में विचाराधीन है,इन सबसे बचने का एक ही तरीका है कि शादी को शादी की तरह से समझा जाये,शादी को समझने के लिये स्त्री और पुरुष दोनों की आत्माओं को समझना जरूरी है,आत्मायें भी तीन प्रकार की होती है,पहली वैज्ञानिक आत्मा है, जो हर बात को प्रत्यक्ष देखना चाहती है,और केवल शादी को संभोग की द्रिष्टि से देखती है,उसे पूजा पाठ धर्म कर्म से कुछ लेना देना नही होता है,खाना पीना और ऐश करना उन आत्माओं वैचारिक भाव होता है,दूसरी महान आत्मायें हुआ करती है,उनका काम किसी भी स्थिति में रहकर केवल अपने द्वारा जन-कल्याण की भावना और पारिवारिक सुख शांति को बनाकर रखना होता है,पिता को पिता और माता को माता,तथा अलावा पारिवारिक लोगों को अपना हितैषी मानकर ही वे अपने जीवन को चलाना चाहते है,उनके लिये धर्म अर्थ काम और मोक्ष का प्रभाव समानान्तर रूप से होना अधिक फ़लदायी होता है,और इसके बिना अगर उनको अलावा किसी आत्मा के साथ किसी प्रकार के सामयिक बदलाव या कारण के द्वारा जोडा जाता है,तो या तो वे अपने जीवन को किसी भी कारण से समाप्त कर लेतीं है,या फ़िर वे अलग रहकर बाकी का जीवन किसी भी तरह से गुजारकर दूसरे जन्म की आशा करती है,तीसरी आत्मा भूतात्मा होती है,जो अपने किसी न किसी प्रकार के पिछले कर्मों का फ़ल भुगतवाने के लिये साथ जुडती है,और जैसे ही उनका कार्य पूरा होता है,वे किसी न किसी बहाने से जीवन के सफ़र में अपने जीवन साथी को अकेला छोडकर किनारा कर लेती है।
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