Wednesday, November 26, 2008

विवाह का स्वरूप

विवाह का स्वरूप आज विवाह वासना-प्रधान बनते चले जा रहे हैं । रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नी के चुनाव में प्रधानता दी जाने लगी है, यह प्रवृत्ति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है । यदि लोग इसी तरह सोचते रहे, तो दाम्पत्य-जीवन शरीर प्रधान रहने से एक प्रकार के वैध-व्यभिचार का ही रूप धारण कर लेगा । पाश्चात्य देशों जैसी स्थिति भारत में भी आ जायेगी । शारीरिक आकर्षण की न्यूनाधिकता का अवसर सामने आने पर विवाह जल्दी-जल्दी टूटते-बनते रहेंगे । अभी पत्नी का चुनाव शारीरिक आकर्षणको ध्यान में रखकर किए जाने की प्रथा चली है, परन्तु अब इसकी प्रतिक्रियामें पति के चुनाव की प्रथा भीसामने आ गई है ।अब असुन्दर पतियों को कोई पत्नी नही कर रहीं हैं और उन्हें दाम्पत्य सुख से वंचित ही रहना पड़ रहा है। समय रहते इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए और शारीरिक आकर्षण उपेक्षा कर सद्गुणों तथा सद्भावनाओं को ही विवाह का आधार पूर्वकाल की तरह बने रहने देना चाहिए । शरीर का नहीं आत्मा का सौन्दर्य देखा जाए और साथी में जो कमी है, उसे प्रेम, सहिष्णुता, आत्मीयता एवं विश्वास की छाया में जितना सम्भव हो सके, सुधारना चाहिए, जो सुधारन हो सके, उसे बिना असन्तोष लाये सहन करना चाहिए । इस रीति-नीति पर दाम्पत्य जीवन की सफलता निर्भर है । अतएव पति-पत्नीको एक-दूसरे से आकर्षण का लाभ मिलने की बात न सोचकर एक-दूसरे के प्रति आत्म-समर्पणकरने और सम्मिलित शक्ति उत्पन्न करने, उसके जीवन विकास की संभावनाएंउत्पन्न करने की बात सोचनी चाहिए । चुनाव करते समय तक साथी को पसन्द करने न करने की छूट है । जो कुछ देखना, ढूँढ़ना, परखना हो, वह कार्य विवाह से पूर्व ही समाप्त कर लेना चाहिए । जब विवाह हो गया, तो फिर यह कहने की गुंजाइश नहीं रहती कि भूल हो गई, इसलिए साथी की उपेक्षा की जाए । जिस प्रकार के भी गुण-दोष युक्त साथी के साथ विवाह बन्धन में बँधें, उसे अपनी ओर से कर्त्तव्यपालन समझकर पूरा करना ही एक मात्र मार्ग रह जाता है । इसी के लिए विवाह संस्कार का आयोजन किया जाता है । समाज के संभ्रांत व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-संबंधियोंकी, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कर्तव्य-बन्धन की उपेक्षा करे, तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें । पति-पत्नी इन संभ्रांत व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा करते हैं । यह प्रतिज्ञा समारोह ही विवाह संस्कार है । इस अवसर पर दोनों की ही यह भावनाएँ गहराई तक अपने मन में जमानी चाहिए कि वे पृथक् व्यक्तियों की सत्ता समाप्त कर एकीकरण की आत्मीयता में विकसित होते हैं । कोई किसी पर न तो हुकूमत जमायेगा और न अपने अधीन-वशवर्ती रखकर अपने लाभ या अहंकार की पूर्ति करना चाहेगा । वरन् वह करेगा, जिससे साथी को सुविधा मिलती हो । दोनों अपनी इच्छा आवश्यकता को गौण और साथी की आवश्यकता को मुख्य मानकर सेवा और सहायता का भाव रखेंगे, उदारता एवं सहिष्णुता बरतेंगे, तभी गृहस्थी का रथ ठीक तरह आगे बढ़ेगा । इस तथ्य को दोनों भली प्रकार हृदयंगम कर लें और इसी रीति-नीति को आजीवन अपनाये रहने का व्रत धारण करें, इसी प्रयोजन के लिए यह पुण्य-संस्कार आयोजित किया जाता है । इस बात को दोनों भली प्रकार समझ लें और सच्चे मन से स्वीकार कर लें, तो ही विवाह-बंधन में बँधें । विवाह संस्कार आरम्भ करने से पूर्व या विवाह वेदी पर बिठाकर दोनों को यह तथ्य भली प्रकार समझा दिया जाए और उनकी सहमति माँगी जाए । यदि दोनों इन आदर्शों को अपनाये रहने की हार्दिक सहमति-स्वीकृति दें, तो ही विवाह संस्कार आगे बढ़ाया जाए ।
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