Friday, October 9, 2009

हमारी धर्मनिरपेक्षता

मिश्रीलाल हमारे मित्रों में सबसे बुध्दिमान व्यक्ति हैं। वे कुछ न कुछ नये विषयों से हमारा ज्ञानवर्धन करते रहते हैं। हमारी मित्र-मंडली अकसर शाम को रंगीलाल जी के घर पर मिलती है। दिनभर की थकान मिटाने के लिए बतकही से बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है।
ऐसी ही बतकही की एक शाम मिश्रीलाल आते ही धमाका करते हुए बड़े ही आक्रोशित अंदाज में कहने लगे- आज जिसे देखो वही धर्मनिरपेक्ष बनता जा रहा है। अगर ऐसा ही रहा तो एक दिन हमारा देश फिर से गुलामी की जंजीर में बंध जाएगा। हम लोगों ने भाभीजी को आवाज देते हुए पहले मिश्रीलाल जी को ठंडा करने के उद्देश्य से फ्रिज का पानी लाने के लिए कहा। ठंडा पानी पीने के पश्चात मिश्रीलाल जी थोड़े ठंडे हुए और कहने लगे- आज जमाने को क्या हो गया है। सभी अपने-अपने कर्तव्य के प्रति विमुख होते जा रहे हैं। जिसे देखो उसने धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ रखा है। हमने पूछा- क्यों भाई! आज कहां फंस गए और यह अनाप-शनाप क्या बके जा रे हो। धर्मनिरपेक्ष होना क्या बुरा है। हमारा राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। क्या यह बुरा है?
वे कहने लगे- नहीं भाई! जिस धर्मनिरपेक्षता की बात आप कर रहे हैं। वह कतई बुरी नहीं है। मगर मैं दूसरे धर्मनिरपेक्षता की बात कर रहा हूं। हम सब समझ गए आज मिश्रीलाल जी कोई दूर की कौड़ी लाए हैं तभी हमसे दूसरी धर्मनिरपेक्षता की बात कर रहे हैं। हम सब पहले से ही उनके ज्ञान के कायल थे, जिज्ञासु विद्यार्थियों की तरह उनके और समीप सरक आए और एकस्वर में निवेदन किया- बताइए ना।
वे बोले- जानते हैं आज देर क्यों हो गई। बाजार में एक महिला के गले से उचक्कों ने सोने की चेन छीन ली। कुछ दूर ही चौकी है। उचक्कों को उनका भी कोई खौफ नहीं था। वे जानते है वहां तैनात कर्मी अपने स्वकर्तव्य पालन के प्रति तटस्थभाव रखते हैं। इसीलिए उचक्कों की इतनी हिम्मत पड़ गई। मैं भी वहीं खड़ा था। सारी घटना मेरे ही आंखों के समक्ष घटी थी। इसलिए जब मैंने महिला के साथ चौकी पर जाकर शिकायत दर्ज करानी चाही तो वे धर्मनिरपेक्ष कर्मी बोले कि क्या आपको और कोई काम नही है। आप संप्रदायिकता फैलाना चाहते हैं। जानते है ना कि इस आरोप में आपको बंद भी किया जा सकता है। पहले तो उस महिला के कारण अपनी बात पर डटा रहा परन्तु जब मैंने देखा कि वह महिला स्वयं ही इस लफड़े में पड़ना नही चाहती तो मैंने भी अपने को किसी तरह इस झंझट से बचाया और धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़कर यहां चला आया।
हमने कहा- परन्तु आप तो हमें दूसरी धर्मनिरपेक्षता के बारे में बताने वाले थे। क्या यह कहानी लेकर बैठ गए। वे बोले- अब भी आप नहीं समझे तो आप लोगों से बढ़कर मूढ़ कोई नहीं होगा। अरे भाई! धर्मनिरपेक्षता में "धर्म" का अर्थ है- "स्वकर्तव्य पालन" और "र्र्निरपेक्ष" का अर्थ है- "लगाव न रखने वाला या तटस्थ रहने वाला"। मतलब जो स्वकर्तव्य पालन से लगाव न रखे अथवा तटस्थ रहे। वही तो सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष है। इसी प्रकार जो व्यक्ति या समाज परंपरा से चला आया हुआ सिध्दांत या मत या रीति या प्रथा का अनुसरण करे वह संप्रदायिक है। वाकई हम सभी मिश्रीलाल जी की धर्मनिरपेक्षता की इस व्याख्या के कायल हो गए।
मिश्रीलाल जी की व्याख्या का मनन करने पर हमें पूरी शासन-प्रशासन व्यवस्था धर्मनिरपेक्ष दिखाई देने लगी1 शासन-प्रशासन व्यवस्था ही नहीं घरद्वार की व्यवस्था भी धर्मनिरपेक्ष दिख रही थी। जिधर भी देख रहे थे धर ही लोग धर्मनिरपेक्ष दिख रहे थे।
आज सरकार खुलेआम अपने को धर्मनिरपेक्ष कह रही है। नेताजी हो या पुलिस हो, शिक्षक हो या विद्यार्थी हो, सरकारी अफसर हो या कर्मचारी हो और तो और घर की पत्नी हो या पुत्र-पुत्री सब के सब धर्मनिरपेक्षता के पक्के अनुयायी हो चले हैं। शिक्षक अपना शिक्षण कार्य छोड़कर चुनाव लड़ रहे हैं। छात्र नेता गैगस्टर में निरूध्द हो रहे हैं। जघन्य अपराधों में निर्लिप्त अपराधियों के हाथों में देश की बागडोर जा रही है। इसके विपरीत हम जैसे अभी भी कुछ संप्रदायिक तत्व बचे हुए हैं, जिन्हें या तो इस सामाजिक व्यवस्था पर मन मसोस कर रह जाना पड़ता है या जब कभी कुछ आक्रोशित होते हैं तो यह जानते हुए भी कि इस व्यवस्था पर हमारे शब्दबाण चलाने पर उनकी कुंभकर्णी नींद नहीं ख्ुलेगी। फिर भी उन्हें जगाने के उपक्रम में कुछ न कुछ लिख ही मारते हैं। परन्तु यहां भी धर्मनिरपेक्षता का वर्चस्व है। वह या तो उसे कहीं छपने नहीं देती या विवाद होने का हौवा खड़ा करके उसके प्रभाव को निष्प्रभावी बनाने के उद्देश्य से उसके मूल तत्व को काट-छांट देती है।
आज घर में हमारी पत्नी जी ने भी मायके जाने के लिए धर्मनिरपेक्षता का व्रत धारण कर लिया है इसलिए घर जाकर पत्नी के धर्म का पालन मुझे ही करना होगा। शेष चर्चा अगले दिन के लिए छोड़कर हम लोगों ने अपने-अपने घर की राह पकड़ ली।

Thursday, September 24, 2009

अथ कथा श्रीरंगीलाल

श्रीरंगीलाल जी मेरे ही मुहल्ले के जीव हैं। एक यही तो हैं हमारे सगे पडोसी। वैसे तो हमारे और भी कई पडोसी हैं। परन्तु जैसा अपनापन श्रीरंगीलाल जी के साथ है वैसा और किसी के साथ नहीं। इसका भी एक कारण है- वह हैं भाभी जी। भाभी जी माने श्रीरंगीलाल जी की एकमात्र सुंदर, सुशील धर्मपत्नी और उनके हाथ की बनी इलायची वाली चाय। अकसर हमारी शामें उन्हीं के घर गुजरती हैं। हम अपने-अपने अनुभव, सुख-दुख एक-दूसरे से बांटते और भाभी जी के हाथ की बनी इलायची वाली चाय और साथ में बाय का आनन्द उठाते।
श्रीरंगीलाल जी प्रदेश सरकार के किसी विभाग के मुलाजिम हैं। वैसे तो प्रदेश सरकार के किसी विभाग का मुलाजिम होना अपने आप में काफी अहमियत रखता है। यहां ऊपरी कमाई की काफी गुंजाईश रहती है। यह ऊपरी कमाई वेतन से अधिक मानी जाती है। यहां रोज कोई न कोई मुर्गा फंस ही जाता है। परन्तु इसके विपरीत श्रीरंगीलाल जी के बारे में सुना जाता है कि वे काफी ईमानदार व्यक्ति हैं। इसका भी एक कारण है वे प्रदेश सरकार के एक ऐसे विभाग से संबध्द हैं, जिसका दूर-दूर तक पब्लिक से कोई भी डीलिंग नहीं है। उनका विभाग सरकारी कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने का कार्य करता है। भई जब पब्लिक से डीलिंग ही नहीं है तो ऊपरी कमाई का जरिया ही कहां से आए। देखा जाए तो श्रीरंगीलाल जी का ईमानदार होना भी अपने आप में एक मजबूरी ही है। वैसे कहा भी जाता है कि व्यक्ति ईमानदार तभी तक रह पाता है, जब तक उसे बेईमानी करने का मौका नहीं मिलता। मौका मिले तो विभाग ही बेच दे। हां तो वैसे तो श्रीरंगीलाल जी ईमानदार व्यक्ति हैं, परन्तु कभी-कभार बच्चों की फरमाइश पर विभाग से लेखन सामग्री मतलब रजिस्टर, पेन्सिल, फोटोपेपर आदि ले आते हैं, इसे बेईमानी की श्रेणी में नहीं लाया जा सकता है। क्योंकि यह प्रत्येक सरकारी कर्मचारी के मौलिक अधिकार की श्रेणी में आता है। इसी प्रकार सरकारी आयोजनों की व्यवस्था में से उनके द्वारा कुछ बचा लेना भी बेईमानी की श्रेणी में नहीं रखना चाहिए, क्योंकि इसे भाग-दौड़ की एवज में बचाया हुआ पारिश्रमिक माना जाना चाहिए।
ऐसे ही एक दिन शाम को भाभी जी के हाथ की बनी चाय पीने की गरज से जब मैं श्रीरंगीलाल जी के घर पहुंचा तो देखा कि श्रीरंगीलाल जी गहरी सोच की मुद्रा में बैठे हैं। उनके माथे पर चिन्ता की गहरी लकीरें उभर आईं हैं। मुझे देखते ही बोले- आइए शर्मा जी। आप की ही प्रतीक्षा कर रहा था। मैंने पूछा- क्या बात है। काफी चिन्तित दिख रहे हैं। कुशल मंगल तो है ना। बोले- वही तो नहीं है। मुख्यालय से खबर आई है एक घाघ अफसर की तैनाती यहां हो रही है। सुना है कि वह बड़ा ही बेईमान किस्म का अफसर है। बात-बात में रिश्वत मांगता है और न दो तो अनुशासनिक कार्रवाई कर देता है। अब हमारी ईमानदारी का क्या होगा। इसकी लाज कैसे बचेगी। मैंने कहा- इसमें कौन सी बड़ी बात है। मुख्यालय में आपकी पैठ है ही। उसका स्थानांतरण रूकवा दो। कहने लगे- वह भी कोशिश करके देख ली। वह भी बड़ा सोर्स वाला है। उसी ने अपने प्रयास से यहां इस जिले में स्थानांतरण करवाया है। मैं ही नहीं पूरा का पूरा स्टाफ चिन्तित है। अब क्या होगा शर्मा जी।
मामला वाकई काफी गंभीर था। आज की चाय में वह स्वाद महसूस नहीं हो रहा था। अनमने मन से चाय सुड़की और घर आ गया। इसी उधेड़बुन में एक सप्ताह गुजर गया भाभी जी के हाथ की बनी वह इलायची वाली चाय पीए। एक सप्ताह बाद जब मैं श्रीरंगीलाल जी के घर गया तो श्रीरंगीलाल जी को आफिस की फाइलों में सिर खपाए पाया। काफी अचम्भा हुआ, जो शख्स यह कहता था कि आफिस में कोई काम नहीं है सारा दिन मक्खी मारते बीत जाता है। आज अचानक इतना सारा काम कहां से टपक गया जो आफिस के बाद घर पर भी उसे निपटाने की नौबत आ गई हो। रहा न गया पूछ ही लिया। श्रीरंगीलाल जी रूहासे हो गए और उसी अंदाज में कहने लगे- उस घाघ अफसर ने ज्वाइन कर लिया है और सारे स्टाफ की नाक में दम कर दिया है। आफिस के सारे पोर्शनों के स्टेटमेंट तैयार करवा रहा है। नया-पुराना सभी विवरण मांग रहा है। प्रस्तुत नहीं करने पर अनुशासनिक कार्रवाई की धमकी दे रहा है। कहते-कहते मानो श्रीरंगीलाल जी अभी रो ही पड़ेंगे। मुझे उनकी दशा पर सहानुभूति होने लगी। जिस व्यक्ति ने अपने अब तक कार्यकाल में कभी कोई फाइल पलटकर नही देखी। सारे दिन आफिस में मक्खी मारता था। अचानक इतना सारा काम कैसे निपटाएगा। मैं सांत्वना के दो शब्द बोलने ही वाला था कि वे गिड़गिड़ाने लगे- आप ही कोई युक्ति बताओ कैसे इस विजातीय तत्व से छुटकारा पाया जाए। मैंने कहा- इसमें कौन सी बड़ी बात है। हम भारतीयों में इतनी क्षमता तो है ही किसी को भी जड़ से उखाड़ फेक सकते हैं। जब हमने तीन सौ वर्ष पुराने अंग्रेजी शासन के दरख्त को उखाड़ फेका तो फिर इसकी क्या बिसात।
श्रीरंगीलाल जी ने मानो इस महामंत्र को आत्मसात कर लिया हो। जोर-जोर से सिर हिलाने लगे। इस महाअभियान को चलाने के लिए अगले दिन ही पूरे स्टाफ की गुप्त बैठक श्रीरंगीलाल जी के घर पर आहूत की गई। गहन विचार विमर्श हुआ। निर्णय के अनुसार चार दल का गठन हुआ। सबके कार्य निर्धारित हुए। कार्य निर्धारण के अनुसार पहले दल, जिसमें नरम मिजाज के सदस्य थे, को असहयोग आंदोलन छेड़ना था। दूसरे दल, जिसमें गरम मिजाज के सदस्य थे, को बात-बात में डराना धमकाना था। तीसरे दल, जिसमें कूटनीति शास्त्र के विशेषज्ञ थे, को कथित विजातीय तत्व का शुभचिंतक बनकर उससे गलत-सलत कार्य के लिए उकसाना और उसे सतर्कता मामलों में उलझाना था। सबसे महत्वपूर्ण कार्य चौथे दल के रूप में महिला मोर्चा को सौपा गया था। इसके अंतर्गत विजातीय तत्व जब तीन तरफा प्रहार से किसी तरह बचकर निकलना चाहे तो उस पर अपना संविधान प्रदत्त ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना था। सभी अपने-अपने कार्य में निपुण थे। और जो नहीं थे उन्हें बकायदा क्रैश कोर्स कराया गया।
इस बीच मुझे आवश्यक कार्यवश करीब एक पखवाड़े के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा। व्यस्तता के कारण न ही मैं अपने सगे पड़ोसी का हाल-चाल ले सका और न ही उनकी ओर से कोई समाचार दिया गया। एक पखवाड़े के पश्चात जब मैं वापस आया तो सोचा आज शाम को भाभी जी के हाथ की बनी चाय पीने अवश्य जाऊंगा और लगे हाथ श्रीरंगीलाल जी के आफिस का हाल-चाल भी पूछ लूंगा। परन्तु यह क्या शायद श्रीरंगीलाल जी को मेरे वापस आने की खबर मिल चुकी थी। आफिस का काम निपटाकर जैसे ही शाम को मैं घर पहुंचा वे मुझे मेरे ही घर पर मिल गए। उनके हाथ में मिठाई का डिब्बा था। प्रसन्न मुद्रा में उन्होंने मुझे लपककर अपनी बांहों में भर लिया। बोले- शर्माजी, आज हम उस विजातीय तत्व के चंगुल से हमेशा के लिए मुक्त हो गए हैं जिसने हम जैसे सरकारी दामादों को अपना गुलाम बनाना चाहा। आपके मंत्र के प्रभाव से ही उसे काले पानी की सजा हो गई है। पूरा स्टाफ आपका हार्दिक शुक्रगुजार है। घर-घर मिठाईयां बांटी जा रही हैं। हम सबकी तरफ से यह मिठाई आपके लिए है।
श्रीरंगीलाल जी को प्रसन्न देखकर मुझे भी हार्दिक प्रसन्नता हुई और होती भी क्यों ना। आखिर वे जो ठहरे मेरे सगे पड़ोसी ही ना। अपने सगों को प्रसन्न देखकर कौन अभागा प्रसन्न नहीं होगा। अत: मेरा प्रसन्न होना स्वभाविक था। परन्तु साथ ही एक हार्दिक कष्ट भी हुआ कि आज भाभी जी के हाथ की बनी इलायची वाली चाय से महरूम जो होना पड़ा। फिर भी यह तो पता चल ही गया कि यह मंत्र साधारण मंत्र नहीं है बल्कि महामंत्र है। इस महामंत्र का प्रयोग अगर किसी पर कर दिया जाए तो समझो वो गया ही गया। इस महामंत्र के प्रयोग से जैसे श्रीरंगीलाल एंड पार्टी का भला हुआ वैसे ही भगवान अन्य मुसीबत के मारो का भी भला करे।
इति कथा श्रीरंगीलाल!

Monday, April 27, 2009

दु:ख के सब साथी सुख में ना कोय

क्यों ! चौंक गए ना। आपको शायद यह शीर्षक उल्टा-पुल्टा लगा होगा। या तो लेखक सिरफिरा लगा होगा। लिखना चाहिए था "सुख के सब साथी दु:ख में ना कोय" यही बोल तो "गोपी" फिल्म में नायक ने गाया था, जबकि यहां लेखक ने लिख मारा "दु:ख के सब साथी सुख में ना कोय"। पर भाईजान मेरे हिसाब से आज के जमाने में यही शीर्षक सोलह आने खरा है। बोले तो गोलघर वाले सुनार की दुकान जितना। हमारे गोलघर वाले सुनार महोदय अक्षय तृतीया पर खरा सोना देने का दावा कर रहे हैं। यानि बाकी के दिनों में कैसा? वैसे तो हमारे देश की सबसे विश्वसनीय मानी जाने वाली बैंकिग संस्था भारतीय स्टेट बैंक ने भी सभी लोकप्रिय अखबारों में मोटे-मोटे अक्षरों विज्ञापन दिया है कि उनके यहां अक्षय तृतीया को अंतर्राष्ट्रीय मानक वाला खरा सोना रियायती दाम पर मिलेगा। पर मेरे हिसाब से गोलघर वाले सुनार से खरीदना ज्यादा अच्छा होगा। पूछो क्यों? अरे भाई, गोलघर वाले सुनार महोदय ने सोने के दाम का फुल फाइनेंस करने का भी तो वायदा किया है। यानि हमें किश्तों में इसका भुगतान करना पड़ेगा। है ना फायदे वाली बात। आजकल वैसे भी किश्तों पर सामान लेने का प्रचलन चल पड़ा है। जिसे देखो वो अपने जरूरत की चीजें थोड़ा पैसा खर्च करके किश्तों ले रहा है। टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, कार, बाइक सहित जितनी भी लक्जरी के सामान हैं, सभी तो आसान किश्तों पर मार्केट में उपलब्ध हैं। तो हम क्यों एकमुश्त रकम अपनी गांठ से खर्च करके सामान खरीदें। टीवी पर विज्ञापन देने वाली बहनजी भी कहती हैं - समझदारी इसी में है।
हां तो हम बात कर रहे थे शीर्षक की- "दु:ख के सब साथी सुख में ना कोय"। अपने आस-पास जरा निगाह उठाकर देख लीजिए। आपको इससे संबंधित ढ़ेर सारे उदाहरण बिना अधिक प्रयास के मिल जाएंगे। इसीलिए मेरा मानना है कि यह शीर्षक बिलकुल खरा है। चाहें तो किसी भुक्तभोगी की कसौटी पर रखकर इसे परख सकते हैं। ऐसे ही एक भुक्तभोगी से मेरी मुलाकात हुई। खैर-खैरियत का आदान-प्रदान हुआ। बातचीत के दौरान उसने बड़े ही गूढ़ रहस्य से मुझे अवगत कराया। बोले- शर्माजी, आप क्या सोचते हैं। क्या जो भी आपके दु:ख में शामिल होता है, वे सभी आपके शुभचिन्तक हैं? मैंने कहा-हां। उन्होंने कहा- नहीं, उनमें से अधिकांश आपके दु:ख का सुखभोग करने आते हैं। उनका ऊपर से मुख उदास, अंदर से मन उल्हास होता है। आप जितने ज्यादा दु:खी, वे उतने ज्यादा प्रसन्न होते हैं। वे आपके दु:ख में शरीक तो होते हैं। परन्तु बाहर निकलते ही आपके अवगुणों का बखान कर-करके अपनी भड़ास निकालते हैं। बड़ा सयाना बनता फिरता था। हाथ ही नहीं रखने देता था। अब मजा चखेगा। इसके विपरीत जहां आप प्रसन्नचित्त दिखे नहीं कि लगा उनके कलेजे पर सांप लोटने। आपको खुश देखकर वे बिचारे दु:खी हो जाते हैं। आज के जमाने में अगर किसी से पूछा जाए कि आप दु:खी क्यों हैं। वह कहेगा कि मेरा पड़ोसी सुखी है। इसी प्रकार किसी दिन वह प्रसन्न दिख जाए तो पूछा जाए कि वह इतना प्रसन्न क्यों है। वह कहेगा कि मेरा पड़ोसी बड़ा दु:खी है। आज के जमाने में सुख-दु:ख के अनुभव का पैमाना दूसरों के दु:ख-सुख पर आधारित हो गया है। पड़ोसी दु:खी हम सुखी, पड़ोसी सुखी हम दु:खी। मैंने उन सज्जन का इस गूढ़ रहस्य से परिचित कराने के लिए हृदय से आभार प्रकट किया।
मुझे एक कहानी भी याद आ रही है, जो बचपन में मेरे पिताजी ने मुझे सुनाई थी। एक कामी व्यक्ति था। कामी से मेरा आशय कामना रखने वाला चाहे, अपने हित की कामना रखता हो या किसी के अहित की। पहले के जमाने में भी अधिकांश तपस्वी किसी ना किसी के अहित की कामना लेकर ही तपस्या किया करते थे और अब भी करते हैं। हां तो उस कामी व्यक्ति ने भगवान शिव को तपस्या के लिए चुना क्योंकि वह जानता था कि भगवान शिव ही ऐसे भोले हैं, जो अत्यल्प तपस्या से ही प्रसन्न हो जाते हैं। इसमें सती (गौरी) की तपस्या अपवाद मानी जाएगी, क्योंकि उन्होंने शिव को पतिरूप में पाने के लिए हजारों वर्षों तक उनकी तपस्या की, तब जाकर शिव प्रसन्न हुए थे। इस घोर कलयुग में भगवान ने किसी मानव को इतनी ज्यादा आयु ही नहीं दी और आज के मानव के पास इतना फालतू समय ही नहीं है कि वह सौ वर्ष तक भी तपस्या कर सके। लब्बो-लुआब शिव उस कामी व्यक्ति की तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्होंने उससे कोई एक वर मांगने को कहा, परन्तु भगवान तो ठहरे अंतर्यामी। वे जानत-बूझते थे इस कामी की इच्छा। अत: उन्होंने जानबूझ कर एक शर्त भी जोड़ दी कि जो तुम अपने लिए मांगोगे उससे दूना तुम्हारे पड़ोसियांे और शुभचिन्तकों को स्वयमेव मिल जाएगा फ्री में। याचक परेशान। भगवान ने उसे यह किस दुविधा में डाल दिया। जिस इच्छा को लेकर उसने तपस्या की थी कि वह अपने पड़ोसियों और अपने इष्ट-मित्रों से अधिक सार्मथ्यवान, धनवान हो जाए। परन्तु भगवान ने तो सारा गुड़-गोबर ही कर दिया। तपस्या मैंने की परन्तु जितना मैं अपने लिए मांगूंगा उससे दूना उन लोगों को फ्री में मिल जाएगा। हाय रे ! भगवान की अद्भुत कृति ईर्ष्यालु जीव, उसने काफी सोच-विचार भगवान से कहा कि मेरी एक आंख फूट जाए। आगे क्या हुआ होगा आप जान ही गए होंगे। भगवान ने यह कैसा जीव पैदा कर दिया जो दूसरों अहित में ही अपना हित समझता है।
मैंने पुस्तकों में थ्यौरी पढ़ी है कि दु:ख में जो साथ निभाए वही आपका सच्चा मित्र, सच्चा साथी, सच्चा हितैषी होता है। पर अनुभव (प्रैक्टिकल) ने बताया कि दु:ख में शामिल होने वाले सभी आपके सच्चे मित्र, सच्चे हितैषी नहीं होते हैं। बल्कि उनमें से अधिकांश हितैषी की खाल ओढ़कर आपके घाव को कुरेद कर उस पर आयोडायज्ड नमक छिड़ककर परमानन्द का सुखभोग करने वाले होते हैं। ऐसा ही अपने को मेरा परम हितैषी घोषित करने वाले मेरे एक मित्र ने जब सुना कि मेरा एक्सीडेंट हो गया और उसमें मेरा पैर फ्रैक्चर हो गया। उसने मुझे फोन करके अपनी संवेदना प्रकट की और लगे हाथ एक सप्ताह पहले बीते हुए मेरे जन्मदिन की मुबारकबाद भी दे डाली। मेरी समझ में यह नहीं आ रहा था कि मेरे इस शुभचिन्तक ने मुझे मेरे जन्मदिन पर अपनी संवेदना प्रकट करने के लिए फोन किया था या पैर फ्रैक्चर होने की मुबारकबाद देने के लिए। काफी मनन-मंथन करने के पश्चात मेरे मन ने मुझसे कहा कि वह मेरा सच्चा हितैषी है उसे मेरे जन्मदिन पर मुबारकबाद देने की फुरसत न मिली हो न सही। कम से कम उसने मेरा पैर फ्रैक्चर होने पर अपनी संवेदना प्रकट करने के लिए समय तो निकाल ही लिया। इससे एक बात तो सिद्व होती है कि वह मेरे सुख के दिन का साथी न सही दु:ख का तो साथी है ही।
आपको कुछ शुभचिन्तक अथवा परम हितैषी ऐसे भी मिल जाएंगे जो आपके दु:ख में घड़ियाली आंसू बहाते हैं, परन्तु जहां आपने उन हितैषी बंधु से किसी मदद, चाहे समय की हो या धन की या तन की, अपेक्षा की नहीं कि वे लगते हैं अपने को ब्रह्माण्ड का सबसे दीन-हीन एवं अभावग्रस्त बताने। वे अपनी विपदा की पोथी-पत्रा बांचने बैठ जाते हैं। अब आप सोचने लगते हैं कहीं हम भी इनके दु:ख की कल-कल बहती नदी के वेग में बह ना जाएं। आपको झट से अपना आवेदन वापस लेना पड़ता है और बड़े विनम्र भाव से, परन्तु अंदर से कुढ़ते हुए, उनसे कहना पड़ता है कि आप आए, दु:ख में शामिल हुए, अपनी संवेदनाएं प्रकट की, मेरे घाव पर नमक सॉरी मरहम लगाया, शहद से भींगे हुए दो फ्री के मीठे बोल बोले यही हमारे लिए दुनिया की सर्वश्रेष्ठ शुभकामना है। आपका वह अनन्य मित्र, परम हितैषी भी मन ही मन ईश्वर को लाख धन्यवाद देगा कि चलो मदद-वदद की बला से छुटकारा मिला। वरना फालतू में धन-जन-तन की बाट लग जाती।
आजकल मैं भी अपने अनुभव का लाभ अपने ईष्ट मित्रों में धड़ल्ले से बांटने में लग गया हूं। इससे मुझे भी एक अनिर्वचनीय आत्मिक सुख का अनुभव होता है। मस्तराम जी, कहने को तो मेरे परम मित्र हैं, पर उनको मुझे दु:खी देखना बड़ा रास आता है। जबसे मुझे उनकी इस अभिलाषा के बारे में ज्ञान हुआ, तब से मैंने भी उनको प्राय: दु:ख के झटके देना प्रारम्भ कर दिया है। एक सुबह वे मॉनिंग वॉक पर मिल गए। बोले कैसे हैं शर्माजी ! आज मैंने उनको झटका देने का पूरा प्लान बना रखा था। अत: चहक कर बोला- बड़ी गुड न्यूज है। मेरा छोटा बेटा कल अपनी क्लास में 93 प्रतिशत अंको से पास हुआ है। मैं जानता हूं कि उनका सुपुत्र कभी भी 60 प्रतिशत अंकोंे से उबर नही पाया है। अत: मेरा दमकता चेहरा देख कर उनको हांफी चढ़ गई। उच्च रक्तचाप की शिकायत महसूस करने लगे। लगा अभी मूर्छित हो जाएंगे। उनकी यह दशा देखकर मेरे तुरन्त ही उनके कान में कहा कि पर मेरे बेटे की क्लास में सातवीं पोजीशन आई है। छ: बच्चे उससे ज्यादा अंक पाए हैं। इतना सुनना था कि आश्चर्यजनक रूप से मस्तराम जी की हालत में सुधार होने लगा। धीरे-धीरे वे सामान्य पोजीशन में आ पाए।
इसी तरह मेरे एक और अजीज है छठी प्रसाद जी। वे भी मस्तराम जी की तरह ही दूसरों के दु:ख में सुख और सुख में दु:ख का अनुभव करने वाले जीव। मैं उन्हें भी अक्सर सुख और दु:ख का मजा चखाता रहता हूं। इससे मुझे भी एक अनोखे मानसिक सुकून का अनुभव होता है। देखा जाए तो मैं भी तो उसी ईश्वर की कृति हूं जिसकी हमारे अन्य ईष्ट-मित्र। इसलिए मुझे भी दूसरों को दु:खी करके प्रसन्नता होती है जो कि स्वभाविक ही है। मैं जिस विभाग में कार्यरत हूं। मेरे द्वारा किए गए सर्वश्रेष्ठ कार्य (संगी-साथियों की नज़रों में तेल लगाने) के लिए मेरे अधिकारी द्वारा विभाग के सर्वोच्च पुरस्कार के लिए विगत कई बार से मेरे नाम को संस्तुत किया जाता था। परन्तु किन्हीं कारणों से मेरे नाम पर विचार नही हो पाता था। इसकी सूचना पाकर मेरे कथित संगी-साथियों को अपार हर्ष होता था, उनमें हमारे छठी प्रसाद जी सबसे आगे रहते थे। वे अपने खिले हुए थोबड़े के साथ अपनी संवेदना प्रकट करने मेरे पास अवश्य आते थे और मैं अंदर ही अंदर कुढ़ कर रह जाता था। इस बार भी मेरा ही नाम पुन: सर्वोच्च पुरस्कार के लिए नामित किया गया। छठी प्रसाद जी एंड कंपनी को पूरा विश्वास था कि इस बार भी विगत वर्षों की भांति ही हश्र होगा। वे आश्वस्त थे। पर इस बार प्रसन्न होने की बारी मेरी थी। जैसे ही छठी प्रसाद जी एंड कंपनी के लिए इस अशुभ समाचार की सूचना विभाग में आई। लगा छठी प्रसाद जी को फालिज मार जाएगा। वे संज्ञाशून्य होकर मेरा दमकता चेहरा देख रहे थे। उनको दु:ख के सागर में गोता लगाते देखकर मैं भी मन ही मन प्रसन्न हो रहा था। अन्त में उनको और अधिक दु:खी करने उद्देश्य से मैंने उनसे कहा- क्यों मित्र ! क्या मुझे बधाई भी नहीं दोगे। उन्होंने बुझे मन से मुझे बधाई दी। उनका बुझा चेहरा देखकर मेरा मन-मयूर नाच रहा था।
ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति मानव रूपी यह जीव वाकई बड़ी ईर्ष्यालु है। यह दूसरों के दु:ख में सुखी और दूसरों के सुख में दु:खी होता है। यह ईर्ष्यावश दूसरों के सुख को शेयर नही करता और यदि करता भी है तो मात्र दिखावे के लिए। परन्तु किसी के दु:ख में सुखलाभ लेने के लिए अवश्य ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है और जरूरत पड़ने पर घड़ियाली आंसू बहाने में भी गुरेज नहीं करता है। इसीलिए मेरा मानना है- दु:ख के सब साथी सुख में ना कोय।

Monday, February 23, 2009

हमारे मस्तराम जी

हमारे कार्यालय में एक मस्तराम जी कार्य करते हैं। अपने नाम के अनुरूप ही मस्तराम जी काफी मस्त तबीयत के व्यक्ति हैं। उनका कार्यालय आने-जाने व रहने का कोई निर्धारित समय नहीं है। जब मन करे आना, जब मन करे जाना। जो मन करे काम करना, नहीं मन करें तो नहीं करना। टोका-टोकी उनको बिलकुल भी पसन्द नहीं है। खुदा न खासते कोई काम के लिए कह भर दिया जाए तो पूरे कार्यालय को सिर पर उठा लेना उनकी आदत सी है। उन्होंने अपने जैसे ही कुछ चेले-चौपाटी भी पाल रखे हैं, जो उनकी उचित-अनुचित बातों का पूरा समर्थन करते हैं और कंधे से कंधा मिलाकर ''साथी हाथ बटाना'' तर्ज पर राग अलापने लगते हैं। गाहे-बगाहे जब भी मस्तराम जी अपने चेले-चौपाटी के साथ राग अलापने बैठ जाते हैं तो पूरा का पूरा कार्यालय रॉक संगीत से गूंज उठता है। शब्द अस्पष्ट बस एक तेज संगीत की धुन और कुछ नहीं। पूरा माहौल संगीतमय बन जाता है। यह संगीत सभा अक्सर हमारे कार्यालय में होती ही रहती है। इस संगीत सभा का लुफ्त हम ही नहीं बल्कि अन्य कार्यालय के कर्मचारी भी उठाने चले आते हैं। मस्तराम जी एवं उनके चेले-चौपाटी के संगीत संगत का श्रवण हम लोगों को चाहे-अनचाहे करना ही पड़ता है।
मस्तराम जी अपनी आदत के मुताबिक कार्यालय खुलने के एक-डेढ़ घंटे बाद ही हॉफते-डॉफते आते हैं और आकर शहर की ट्रैफिक व्यवस्था और उसके कु:प्रबंधन को लेकर एक-दो घंटे की गरमा-गरम बहस छेड़ देते हैं। उस बहसबाजी में उनके चेले-चौपाटी भी, जो इस दुर्व्यवस्था एवं कु:प्रबंधन के शिकार हैं, बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। फिर उसके बाद शुरू हो जाती है उस दिन के दैनिक समाचार-पत्रों के देशीय-अंतर्देशी, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय एवं स्थानीय समाचारों की समीक्षा। इसके लिए एक से बढ़कर एक समीक्षक मंचासीन हो जाते हैं और शुरू हो जाती है एक-एक समाचार पर एक-एक, डेढ़-डेढ़ घंटे की समीक्षा। हमारे मस्तराम जी मुख्य समीक्षक की भूमिका में रहते हैं। चूंकि मस्तराम जी को टोका-टोकी बिलकुल भी पसन्द नहीं है। इसलिए जब वे किसी समाचार की समीक्षा करते हैं तो किसी की सुनते नहीं हैं अपनी ही जोते जाते हैं। चाहे ठीक हो या गलत। उनके चेले-चौपाटी भी मजबूरन उनकी हां में हां मिलाते रहते हैं। उनकी हां में हां न मिलाने का मतलब गुरू महराज को नाराज करना और उनके नाराज होने का मतलब कार्यालय में रॉक संगीत गूंजना। कर्मचारी तो कर्मचारी, अधिकारी भी मस्तराम जी को नाराज करने का दुस्साहस करने से हिचकते हैं।
कहा जाता है कि मस्तराम जी राजा-महराजाओं के चश्म-ओ-चिराग हैं। उनके पुरखे किसी जमाने में इस जहां पर राज किया करते थे। अच्छे-अच्छे लोग उनके यहां दरबार किया करते थे। सैकड़ों नौकर-चाकर थे। कोई भी काम अपने हाथ से नहीं बल्कि सभी काम के लिए अलग-अलग नौकर थे। आज भी हमारे मस्तराम जी को अपने हाथ से काम करना बिलकुल भी नहीं भाता है और अपने दरबारियों से घिरे रहकर अपनी गुणगान सुनना उनका सर्वाधिक प्रिय शगल है। सरकारी काम करना उनकी शान के सख्त खिलाफ है। उनका कहना है कि आज भी उनके यहां सैकड़ों एकड़ भूमि पर पुदीना सूख रहा है। वे यहां काम करने थोड़े ही आए हैं। हम राजा-महराजा रहे हैं। हम राज करते आए हैं। आज भी राज ही करेंगे। तुम लोगों के पुरखे प्रजा थे। काम करते थे तो अब तुम्ही लोग काम करो। एक बार गलती से एक नए अधिकारी ने उनको काम के लिए कह दिया तो मस्तराम जी ने अपने दरबारियों यानि चेले-चौपाटियों के सहयोग से इतना बवाल काटा कि वह अधिकारी दुम दबाकर भाग खड़ा हुआ। अब किसी में ऐसी हिम्मत नहीं जो हमारे मस्तराम जी को कोई काम के लिए कह दे।
आज भी हमारे मस्तराम जी अपनी मनमर्जी के स्वयं मालिक हैं। जो मन करता है करते हैं और जो मन नहीं करता नहीं करते। जब मन करता है कार्यालय आते हैं, जब मन करता चले जाते हैं। किसी जमाने में सरकार ने उनके पुरखों (कथित राजा-महराजा) का कर्जा खाया था उसी के एवज में आज मस्तराम जी को बंधी-बंधायी एक मोटी रकम प्रतिमाह बिला-नागा दे रही है। धन्य हो हमारे मस्तराम जी और उनके चेले-चौपाटी।

Saturday, February 7, 2009

दूर करें निगेटिव सोच

फिल्मों एवं टेलीविजन के माध्यम से आज जिस प्रकार की जीवन शैली को समाज में परोसा जा रहा है, उससे समाज का जीवन जीने का नजरिया स्वाभाविक रूप से बदला है। पहले बच्चों को सिखाया जाता था कि 'संतोष' सबसे बढ़कर होता है। इससे उनके भीतर प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपनी इच्छा और आवश्यकता के बीच फर्क करने समझ विकसित होती थी। यही वजह थी कि यदि उन्हें कोई चीज हासिल नहीं हुई, तो वे इसके बारे में निगेटिव सोचने के स्थान पर दुगुने उत्साह के साथ फिर से कोशिश करने में जुट जाते थे। आज हमारी इच्छाएं इतनी ज्यादा बढ़ती जा रही है जिसका कोई अंत नहीं है। आज जब इच्छाएं पूरी नही हो रही हैं तो हमारे अंदर नराकात्मक(निगेटिव) सोच उत्पन्न हो रहा है। बाल अपराध की बढ़ रही घटनाएं इस बात का जीता-जागता प्रमाण है।

इच्छाएं रखें सीमित और हों संतुष्ट

हालांकि आज हालात ऐसे हैं कि हमारी इच्छाएं हर समय बढ़ी जा रही है, भले ही वह हमारी आवश्यकता हो अथवा न हो। इसका छोटा सा उदाहरण ही ले लें कि फोन का कार्य है संचार। आज मोबाइल फोन का युग है। संचार(communication) के लिए हमारी आवश्यकता है फोन या मोबाइल फोन। मोबाइल फोन श्वेत-श्याम (Black & white) हो या रंगीन (Coloured) या हो कैमरायुक्त, यानि किसी से बात करने के लिए उक्त तीनों तरह के फोन एक समान कार्य करते हैं। मेरे पास श्वेत-श्याम (Black & white) मोबाइल फोन है। परन्तु मेरी पत्नी को श्वेत-श्याम (Black & white) फोन पसन्द नही था इसलिए उन्होंने अपने लिए रंगीन (Coloured) मोबाइल फोन ले लिया। आज मेरा बच्चा कहता है कि पापा यह क्या आप श्वेत-श्याम (Black & white) मोबाइल लेकर आफिस जाते हैं आपको कैमरा वाला मोबाइल ले लेना चाहिए। इस तरह देखा जाए तो आज के युवाओं में इच्छाएं बढ़ती ही जा रही हैं। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि जिनकी इच्छाएं पूरी नहीं हो पाती हैं वह अनावश्यक रूप से अपने अंदर हीन भावना पाल लेता है। सच तो यह है कि वह यह मान बैठता है कि दोस्तों में उसकी नाक कट जाएगी या फिर फैंड-सर्किल में वह हीनता महसूस करने लगता है। जबकि देखा जाए कि जिस चीज की वे इच्छा रखते हैं वह वास्तविक रूप से उसकी उतनी आवश्यकता है ही नहीं। आप अपनी इच्छाएं जितना बढ़ाएंगे वह उतनी ही बढ़ती चली जाएगी। अगर किन्हीं कारणों से पूरी न हो पाई तो आप निराश होंगे, आपके अंदर नकारात्मक सोच उत्पन्न होगा, आप निराशा के भंवर-जाल में फंसते चले जाएंगे- चले जाएंगे- चले जाएंगे। इसलिए अनावश्यक रूप से अपनी इच्छाएं न बढ़ाएं उसे सीमित रखें और सुखी रहें।
जीवन में संतुष्टि की जो अनुभूति है, वह दो तरह से होती है। पहली यह कि आपके भीतर हमेशा सकारात्मक भाव बने रहें, भले ही कोई कुछ भी कहे। दूसरा यह कि चाहे आप पूरी तरह सकारात्मक न बन पाएं, लेकिन बहुत हद तक नकारात्मक भावनाओं को अपने से दूर रख पाने में सफल रहें। दरअसल ऐसा तभी संभव होगा, जब हम छोटी सी घटना को तिल का ताड़ बनने से रोक देंगे।

इच्छाएं रखें सीमित और हों संतुष्ट

हालांकि आज हालात ऐसे हैं कि हमारी इच्छाएं हर समय बढ़ी जा रही है, भले ही वह हमारी आवश्यकता हो अथवा न हो। इसका छोटा सा उदाहरण ही ले लें कि फोन का कार्य है संचार। आज मोबाइल फोन का युग है। संचार(communication) के लिए हमारी आवश्यकता है फोन या मोबाइल फोन। मोबाइल फोन श्वेत-श्याम (Black & white) हो या रंगीन (Coloured) या हो कैमरायुक्त, यानि किसी से बात करने के लिए उक्त तीनों तरह के फोन एक समान कार्य करते हैं। मेरे पास श्वेत-श्याम (Black & white) मोबाइल फोन है। परन्तु मेरी पत्नी को श्वेत-श्याम (Black & white) फोन पसन्द नही था इसलिए उन्होंने अपने लिए रंगीन (Coloured) मोबाइल फोन ले लिया। आज मेरा बच्चा कहता है कि पापा यह क्या आप श्वेत-श्याम (Black & white) मोबाइल लेकर आफिस जाते हैं आपको कैमरा वाला मोबाइल ले लेना चाहिए। इस तरह देखा जाए तो आज के युवाओं में इच्छाएं बढ़ती ही जा रही हैं। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि जिनकी इच्छाएं पूरी नहीं हो पाती हैं वह अनावश्यक रूप से अपने अंदर हीन भावना पाल लेता है। सच तो यह है कि वह यह मान बैठता है कि दोस्तों में उसकी नाक कट जाएगी या फिर फैंड-सर्किल में वह हीनता महसूस करने लगता है। जबकि देखा जाए कि जिस चीज की वे इच्छा रखते हैं वह वास्तविक रूप से उसकी उतनी आवश्यकता है ही नहीं। आप अपनी इच्छाएं जितना बढ़ाएंगे वह उतनी ही बढ़ती चली जाएगी। अगर किन्हीं कारणों से पूरी न हो पाई तो आप निराश होंगे, आपके अंदर नकारात्मक सोच उत्पन्न होगा, आप निराशा के भंवर-जाल में फंसते चले जाएंगे- चले जाएंगे- चले जाएंगे। इसलिए अनावश्यक रूप से अपनी इच्छाएं न बढ़ाएं उसे सीमित रखें और सुखी रहें।
जीवन में संतुष्टि की जो अनुभूति है, वह दो तरह से होती है। पहली यह कि आपके भीतर हमेशा सकारात्मक भाव बने रहें, भले ही कोई कुछ भी कहे। दूसरा यह कि चाहे आप पूरी तरह सकारात्मक न बन पाएं, लेकिन बहुत हद तक नकारात्मक भावनाओं को अपने से दूर रख पाने में सफल रहें। दरअसल ऐसा तभी संभव होगा, जब हम छोटी सी घटना को तिल का ताड़ बनने से रोक देंगे।

बचें भावनाओं के उबाल से

मैं जानता हूं, समझता हूं कि मेरे कुछ सहकर्मी मेरी कार्य-शैली से मन ही मन कुछ असंतुष्ट होंगे। वे मुझे अपने गुट में महसूस नहीं करते होंगे। अपने जैसा मुझे भी न बना पाने की कुंठा उनमें होगी। पीठ पीछे मेरी बुराई करते होंगे। परन्तु मैं क्या करूं? मेरी कार्य-शैली ही ऐसी है अपने काम में संलग्न रहना, गुटबाजी में न पड़ना, तिल को ताड़ न बनाना, समय से आना- समय से जाना। तो क्या मैं भी उनकी तरह हो जाऊं? नहीं ना। मैं हमेशा से एक सकारात्मक भाव रखने का प्रयास करता आया हूं और काफी हद तक सफल भी रहा हूं। नकारात्मक सोच को अपने आस-पास भी फटकने नहीं देता हूं। इसलिए संतुष्टि है।‍ फिर भी न जाने क्यूं उन्हें मेरी यह कार्यशैली पसन्द नहीं है। क्या वे मुझे अपने जैसा बनाना चाहते है? नहीं, मैं उनके जैसा हरगिज नहीं बन सकता। इसके लिए मुझे कोई भी कीमत चुकानी पड़े । मैं तैयार हूं । सुकरात की तरह सच्चाई के लिए विष का प्याला भी मुझे मंजूर है । मुझे संतुष्टि है कि मैं अपनी जगह ठीक हूं ।