Saturday, February 7, 2009

बचें भावनाओं के उबाल से

मैं जानता हूं, समझता हूं कि मेरे कुछ सहकर्मी मेरी कार्य-शैली से मन ही मन कुछ असंतुष्ट होंगे। वे मुझे अपने गुट में महसूस नहीं करते होंगे। अपने जैसा मुझे भी न बना पाने की कुंठा उनमें होगी। पीठ पीछे मेरी बुराई करते होंगे। परन्तु मैं क्या करूं? मेरी कार्य-शैली ही ऐसी है अपने काम में संलग्न रहना, गुटबाजी में न पड़ना, तिल को ताड़ न बनाना, समय से आना- समय से जाना। तो क्या मैं भी उनकी तरह हो जाऊं? नहीं ना। मैं हमेशा से एक सकारात्मक भाव रखने का प्रयास करता आया हूं और काफी हद तक सफल भी रहा हूं। नकारात्मक सोच को अपने आस-पास भी फटकने नहीं देता हूं। इसलिए संतुष्टि है।‍ फिर भी न जाने क्यूं उन्हें मेरी यह कार्यशैली पसन्द नहीं है। क्या वे मुझे अपने जैसा बनाना चाहते है? नहीं, मैं उनके जैसा हरगिज नहीं बन सकता। इसके लिए मुझे कोई भी कीमत चुकानी पड़े । मैं तैयार हूं । सुकरात की तरह सच्चाई के लिए विष का प्याला भी मुझे मंजूर है । मुझे संतुष्टि है कि मैं अपनी जगह ठीक हूं ।
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