Monday, February 23, 2009

हमारे मस्तराम जी

हमारे कार्यालय में एक मस्तराम जी कार्य करते हैं। अपने नाम के अनुरूप ही मस्तराम जी काफी मस्त तबीयत के व्यक्ति हैं। उनका कार्यालय आने-जाने व रहने का कोई निर्धारित समय नहीं है। जब मन करे आना, जब मन करे जाना। जो मन करे काम करना, नहीं मन करें तो नहीं करना। टोका-टोकी उनको बिलकुल भी पसन्द नहीं है। खुदा न खासते कोई काम के लिए कह भर दिया जाए तो पूरे कार्यालय को सिर पर उठा लेना उनकी आदत सी है। उन्होंने अपने जैसे ही कुछ चेले-चौपाटी भी पाल रखे हैं, जो उनकी उचित-अनुचित बातों का पूरा समर्थन करते हैं और कंधे से कंधा मिलाकर ''साथी हाथ बटाना'' तर्ज पर राग अलापने लगते हैं। गाहे-बगाहे जब भी मस्तराम जी अपने चेले-चौपाटी के साथ राग अलापने बैठ जाते हैं तो पूरा का पूरा कार्यालय रॉक संगीत से गूंज उठता है। शब्द अस्पष्ट बस एक तेज संगीत की धुन और कुछ नहीं। पूरा माहौल संगीतमय बन जाता है। यह संगीत सभा अक्सर हमारे कार्यालय में होती ही रहती है। इस संगीत सभा का लुफ्त हम ही नहीं बल्कि अन्य कार्यालय के कर्मचारी भी उठाने चले आते हैं। मस्तराम जी एवं उनके चेले-चौपाटी के संगीत संगत का श्रवण हम लोगों को चाहे-अनचाहे करना ही पड़ता है।
मस्तराम जी अपनी आदत के मुताबिक कार्यालय खुलने के एक-डेढ़ घंटे बाद ही हॉफते-डॉफते आते हैं और आकर शहर की ट्रैफिक व्यवस्था और उसके कु:प्रबंधन को लेकर एक-दो घंटे की गरमा-गरम बहस छेड़ देते हैं। उस बहसबाजी में उनके चेले-चौपाटी भी, जो इस दुर्व्यवस्था एवं कु:प्रबंधन के शिकार हैं, बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। फिर उसके बाद शुरू हो जाती है उस दिन के दैनिक समाचार-पत्रों के देशीय-अंतर्देशी, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय एवं स्थानीय समाचारों की समीक्षा। इसके लिए एक से बढ़कर एक समीक्षक मंचासीन हो जाते हैं और शुरू हो जाती है एक-एक समाचार पर एक-एक, डेढ़-डेढ़ घंटे की समीक्षा। हमारे मस्तराम जी मुख्य समीक्षक की भूमिका में रहते हैं। चूंकि मस्तराम जी को टोका-टोकी बिलकुल भी पसन्द नहीं है। इसलिए जब वे किसी समाचार की समीक्षा करते हैं तो किसी की सुनते नहीं हैं अपनी ही जोते जाते हैं। चाहे ठीक हो या गलत। उनके चेले-चौपाटी भी मजबूरन उनकी हां में हां मिलाते रहते हैं। उनकी हां में हां न मिलाने का मतलब गुरू महराज को नाराज करना और उनके नाराज होने का मतलब कार्यालय में रॉक संगीत गूंजना। कर्मचारी तो कर्मचारी, अधिकारी भी मस्तराम जी को नाराज करने का दुस्साहस करने से हिचकते हैं।
कहा जाता है कि मस्तराम जी राजा-महराजाओं के चश्म-ओ-चिराग हैं। उनके पुरखे किसी जमाने में इस जहां पर राज किया करते थे। अच्छे-अच्छे लोग उनके यहां दरबार किया करते थे। सैकड़ों नौकर-चाकर थे। कोई भी काम अपने हाथ से नहीं बल्कि सभी काम के लिए अलग-अलग नौकर थे। आज भी हमारे मस्तराम जी को अपने हाथ से काम करना बिलकुल भी नहीं भाता है और अपने दरबारियों से घिरे रहकर अपनी गुणगान सुनना उनका सर्वाधिक प्रिय शगल है। सरकारी काम करना उनकी शान के सख्त खिलाफ है। उनका कहना है कि आज भी उनके यहां सैकड़ों एकड़ भूमि पर पुदीना सूख रहा है। वे यहां काम करने थोड़े ही आए हैं। हम राजा-महराजा रहे हैं। हम राज करते आए हैं। आज भी राज ही करेंगे। तुम लोगों के पुरखे प्रजा थे। काम करते थे तो अब तुम्ही लोग काम करो। एक बार गलती से एक नए अधिकारी ने उनको काम के लिए कह दिया तो मस्तराम जी ने अपने दरबारियों यानि चेले-चौपाटियों के सहयोग से इतना बवाल काटा कि वह अधिकारी दुम दबाकर भाग खड़ा हुआ। अब किसी में ऐसी हिम्मत नहीं जो हमारे मस्तराम जी को कोई काम के लिए कह दे।
आज भी हमारे मस्तराम जी अपनी मनमर्जी के स्वयं मालिक हैं। जो मन करता है करते हैं और जो मन नहीं करता नहीं करते। जब मन करता है कार्यालय आते हैं, जब मन करता चले जाते हैं। किसी जमाने में सरकार ने उनके पुरखों (कथित राजा-महराजा) का कर्जा खाया था उसी के एवज में आज मस्तराम जी को बंधी-बंधायी एक मोटी रकम प्रतिमाह बिला-नागा दे रही है। धन्य हो हमारे मस्तराम जी और उनके चेले-चौपाटी।
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