Saturday, February 7, 2009

इच्छाएं रखें सीमित और हों संतुष्ट

हालांकि आज हालात ऐसे हैं कि हमारी इच्छाएं हर समय बढ़ी जा रही है, भले ही वह हमारी आवश्यकता हो अथवा न हो। इसका छोटा सा उदाहरण ही ले लें कि फोन का कार्य है संचार। आज मोबाइल फोन का युग है। संचार(communication) के लिए हमारी आवश्यकता है फोन या मोबाइल फोन। मोबाइल फोन श्वेत-श्याम (Black & white) हो या रंगीन (Coloured) या हो कैमरायुक्त, यानि किसी से बात करने के लिए उक्त तीनों तरह के फोन एक समान कार्य करते हैं। मेरे पास श्वेत-श्याम (Black & white) मोबाइल फोन है। परन्तु मेरी पत्नी को श्वेत-श्याम (Black & white) फोन पसन्द नही था इसलिए उन्होंने अपने लिए रंगीन (Coloured) मोबाइल फोन ले लिया। आज मेरा बच्चा कहता है कि पापा यह क्या आप श्वेत-श्याम (Black & white) मोबाइल लेकर आफिस जाते हैं आपको कैमरा वाला मोबाइल ले लेना चाहिए। इस तरह देखा जाए तो आज के युवाओं में इच्छाएं बढ़ती ही जा रही हैं। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि जिनकी इच्छाएं पूरी नहीं हो पाती हैं वह अनावश्यक रूप से अपने अंदर हीन भावना पाल लेता है। सच तो यह है कि वह यह मान बैठता है कि दोस्तों में उसकी नाक कट जाएगी या फिर फैंड-सर्किल में वह हीनता महसूस करने लगता है। जबकि देखा जाए कि जिस चीज की वे इच्छा रखते हैं वह वास्तविक रूप से उसकी उतनी आवश्यकता है ही नहीं। आप अपनी इच्छाएं जितना बढ़ाएंगे वह उतनी ही बढ़ती चली जाएगी। अगर किन्हीं कारणों से पूरी न हो पाई तो आप निराश होंगे, आपके अंदर नकारात्मक सोच उत्पन्न होगा, आप निराशा के भंवर-जाल में फंसते चले जाएंगे- चले जाएंगे- चले जाएंगे। इसलिए अनावश्यक रूप से अपनी इच्छाएं न बढ़ाएं उसे सीमित रखें और सुखी रहें।
जीवन में संतुष्टि की जो अनुभूति है, वह दो तरह से होती है। पहली यह कि आपके भीतर हमेशा सकारात्मक भाव बने रहें, भले ही कोई कुछ भी कहे। दूसरा यह कि चाहे आप पूरी तरह सकारात्मक न बन पाएं, लेकिन बहुत हद तक नकारात्मक भावनाओं को अपने से दूर रख पाने में सफल रहें। दरअसल ऐसा तभी संभव होगा, जब हम छोटी सी घटना को तिल का ताड़ बनने से रोक देंगे।
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