कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें कि आपको यह ब्लॉग कैसा लगा?

Saturday, February 7, 2009

दूर करें निगेटिव सोच

फिल्मों एवं टेलीविजन के माध्यम से आज जिस प्रकार की जीवन शैली को समाज में परोसा जा रहा है, उससे समाज का जीवन जीने का नजरिया स्वाभाविक रूप से बदला है। पहले बच्चों को सिखाया जाता था कि 'संतोष' सबसे बढ़कर होता है। इससे उनके भीतर प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपनी इच्छा और आवश्यकता के बीच फर्क करने समझ विकसित होती थी। यही वजह थी कि यदि उन्हें कोई चीज हासिल नहीं हुई, तो वे इसके बारे में निगेटिव सोचने के स्थान पर दुगुने उत्साह के साथ फिर से कोशिश करने में जुट जाते थे। आज हमारी इच्छाएं इतनी ज्यादा बढ़ती जा रही है जिसका कोई अंत नहीं है। आज जब इच्छाएं पूरी नही हो रही हैं तो हमारे अंदर नराकात्मक(निगेटिव) सोच उत्पन्न हो रहा है। बाल अपराध की बढ़ रही घटनाएं इस बात का जीता-जागता प्रमाण है।
Post a Comment