Friday, October 9, 2009

हमारी धर्मनिरपेक्षता

मिश्रीलाल हमारे मित्रों में सबसे बुध्दिमान व्यक्ति हैं। वे कुछ न कुछ नये विषयों से हमारा ज्ञानवर्धन करते रहते हैं। हमारी मित्र-मंडली अकसर शाम को रंगीलाल जी के घर पर मिलती है। दिनभर की थकान मिटाने के लिए बतकही से बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है।
ऐसी ही बतकही की एक शाम मिश्रीलाल आते ही धमाका करते हुए बड़े ही आक्रोशित अंदाज में कहने लगे- आज जिसे देखो वही धर्मनिरपेक्ष बनता जा रहा है। अगर ऐसा ही रहा तो एक दिन हमारा देश फिर से गुलामी की जंजीर में बंध जाएगा। हम लोगों ने भाभीजी को आवाज देते हुए पहले मिश्रीलाल जी को ठंडा करने के उद्देश्य से फ्रिज का पानी लाने के लिए कहा। ठंडा पानी पीने के पश्चात मिश्रीलाल जी थोड़े ठंडे हुए और कहने लगे- आज जमाने को क्या हो गया है। सभी अपने-अपने कर्तव्य के प्रति विमुख होते जा रहे हैं। जिसे देखो उसने धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ रखा है। हमने पूछा- क्यों भाई! आज कहां फंस गए और यह अनाप-शनाप क्या बके जा रे हो। धर्मनिरपेक्ष होना क्या बुरा है। हमारा राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। क्या यह बुरा है?
वे कहने लगे- नहीं भाई! जिस धर्मनिरपेक्षता की बात आप कर रहे हैं। वह कतई बुरी नहीं है। मगर मैं दूसरे धर्मनिरपेक्षता की बात कर रहा हूं। हम सब समझ गए आज मिश्रीलाल जी कोई दूर की कौड़ी लाए हैं तभी हमसे दूसरी धर्मनिरपेक्षता की बात कर रहे हैं। हम सब पहले से ही उनके ज्ञान के कायल थे, जिज्ञासु विद्यार्थियों की तरह उनके और समीप सरक आए और एकस्वर में निवेदन किया- बताइए ना।
वे बोले- जानते हैं आज देर क्यों हो गई। बाजार में एक महिला के गले से उचक्कों ने सोने की चेन छीन ली। कुछ दूर ही चौकी है। उचक्कों को उनका भी कोई खौफ नहीं था। वे जानते है वहां तैनात कर्मी अपने स्वकर्तव्य पालन के प्रति तटस्थभाव रखते हैं। इसीलिए उचक्कों की इतनी हिम्मत पड़ गई। मैं भी वहीं खड़ा था। सारी घटना मेरे ही आंखों के समक्ष घटी थी। इसलिए जब मैंने महिला के साथ चौकी पर जाकर शिकायत दर्ज करानी चाही तो वे धर्मनिरपेक्ष कर्मी बोले कि क्या आपको और कोई काम नही है। आप संप्रदायिकता फैलाना चाहते हैं। जानते है ना कि इस आरोप में आपको बंद भी किया जा सकता है। पहले तो उस महिला के कारण अपनी बात पर डटा रहा परन्तु जब मैंने देखा कि वह महिला स्वयं ही इस लफड़े में पड़ना नही चाहती तो मैंने भी अपने को किसी तरह इस झंझट से बचाया और धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़कर यहां चला आया।
हमने कहा- परन्तु आप तो हमें दूसरी धर्मनिरपेक्षता के बारे में बताने वाले थे। क्या यह कहानी लेकर बैठ गए। वे बोले- अब भी आप नहीं समझे तो आप लोगों से बढ़कर मूढ़ कोई नहीं होगा। अरे भाई! धर्मनिरपेक्षता में "धर्म" का अर्थ है- "स्वकर्तव्य पालन" और "र्र्निरपेक्ष" का अर्थ है- "लगाव न रखने वाला या तटस्थ रहने वाला"। मतलब जो स्वकर्तव्य पालन से लगाव न रखे अथवा तटस्थ रहे। वही तो सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष है। इसी प्रकार जो व्यक्ति या समाज परंपरा से चला आया हुआ सिध्दांत या मत या रीति या प्रथा का अनुसरण करे वह संप्रदायिक है। वाकई हम सभी मिश्रीलाल जी की धर्मनिरपेक्षता की इस व्याख्या के कायल हो गए।
मिश्रीलाल जी की व्याख्या का मनन करने पर हमें पूरी शासन-प्रशासन व्यवस्था धर्मनिरपेक्ष दिखाई देने लगी1 शासन-प्रशासन व्यवस्था ही नहीं घरद्वार की व्यवस्था भी धर्मनिरपेक्ष दिख रही थी। जिधर भी देख रहे थे धर ही लोग धर्मनिरपेक्ष दिख रहे थे।
आज सरकार खुलेआम अपने को धर्मनिरपेक्ष कह रही है। नेताजी हो या पुलिस हो, शिक्षक हो या विद्यार्थी हो, सरकारी अफसर हो या कर्मचारी हो और तो और घर की पत्नी हो या पुत्र-पुत्री सब के सब धर्मनिरपेक्षता के पक्के अनुयायी हो चले हैं। शिक्षक अपना शिक्षण कार्य छोड़कर चुनाव लड़ रहे हैं। छात्र नेता गैगस्टर में निरूध्द हो रहे हैं। जघन्य अपराधों में निर्लिप्त अपराधियों के हाथों में देश की बागडोर जा रही है। इसके विपरीत हम जैसे अभी भी कुछ संप्रदायिक तत्व बचे हुए हैं, जिन्हें या तो इस सामाजिक व्यवस्था पर मन मसोस कर रह जाना पड़ता है या जब कभी कुछ आक्रोशित होते हैं तो यह जानते हुए भी कि इस व्यवस्था पर हमारे शब्दबाण चलाने पर उनकी कुंभकर्णी नींद नहीं ख्ुलेगी। फिर भी उन्हें जगाने के उपक्रम में कुछ न कुछ लिख ही मारते हैं। परन्तु यहां भी धर्मनिरपेक्षता का वर्चस्व है। वह या तो उसे कहीं छपने नहीं देती या विवाद होने का हौवा खड़ा करके उसके प्रभाव को निष्प्रभावी बनाने के उद्देश्य से उसके मूल तत्व को काट-छांट देती है।
आज घर में हमारी पत्नी जी ने भी मायके जाने के लिए धर्मनिरपेक्षता का व्रत धारण कर लिया है इसलिए घर जाकर पत्नी के धर्म का पालन मुझे ही करना होगा। शेष चर्चा अगले दिन के लिए छोड़कर हम लोगों ने अपने-अपने घर की राह पकड़ ली।
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