Thursday, June 12, 2014

दूर के रिश्तेदार

डा. बद्री प्रसाद ने अभी हाल ही में इस शहर के एक सरकारी अस्पताल में सरकारी चिकित्सक के रूप में ज्वाइन किया है. यह उनकी इस शहर में और अपनी सेवा की पहली पोस्टिंग थी. डा. बद्री प्रसाद ने शीघ्र ही अपनी व्यवहार कुशलता, मृदु स्वभाव एवं हाथ के हुनर से इस शहर के लोगों का दिल जीतकर अपना स्थान फेवीकोल से जोडकर पक्का बना लिया था. उनकी पोस्टिंग के कुछ दिनों के पश्चात मुझे पता चला कि डा. बद्री प्रसाद जी तो  हमारे दूर के रिश्तेदार हैं.
मेरी उनसे दूर की रिश्तेदारी उस तरह की बिलकुल नहीं थी जैसे कि आम तौर पर हमारे अन्य बन्धुओं की उस शहर में आने वाले उच्चाधिकारियों के साथ होती है. हमारे इन बन्धुओं के बारे सर्वविदित है कि उनकी बिरादरी के किसी उच्चाधिकारी की शहर में पोस्टिंग हुई नहीं कि उस बिरादरी के सभी लोगों का कहीं ना कहीं से उस अधिकारी से रिश्ता जुड़ जाता है. कोई उसके मामा के चाचा के पोते का नाना बन जाता है तो कोई उसके चाचा के मामा के नाती का दादा बन जाता है और भी जाने कौन-कौन सा रिश्ता हमारे ये बन्धू जोड़ लेते हैं. परन्तु डा. साहब से मेरा इस तरह का रिश्ता नहीं था इसलिए भावनात्मक रूप से उनसे मेरा जुड़ाव होना स्वभाविक ही था. मेरा स्वभाव उन बन्धुओं की तरह नहीं है कि अपने स्वार्थ की खातिर छोटी-छोटी बातों के लिए भी जाकर उनसे अपने रिश्ते का परिचय दिया जाए और अपना उल्लू सीधा किया जाए. शायद इसी कारण उनकी पोस्टिंग के काफी दिनों के पश्चात भी मेरा उनसे साक्षात्कार नहीं हो पाया.

एक बात आपको बता दूं कि मैं अपने स्वास्थ्य के प्रति काफी सचेत रहने वाला प्राणी हूं. इसलिए प्रतिदिन मॉर्निग वाक के लिए मैं अपने इष्ट मित्रो के साथ आफिसर्स कालोनी की ओर ही जाता हूं. अब आप पूछेंगे कि क्यूं मैं आफिसर्स कालोनी की ओर ही जाता हूं. तो मैं आपको भी बता दूं शायद आप भी इससे लाभांवित हो सकेंगे. मॉर्निग वाक के लिए यहां का पर्यावरण स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी अच्छा है. क्योंकि सरकार ने सरकारी अधिकारियों के बंगलों के आस-पास पर्यावरण का विशेष ध्यान दे रखा है. यहां बामुश्किल दो या तीन सदस्य वाले सरकारी अफसरों के लिए बड़े-बड़े बंगले, जिसमें करीब सात-आठ कमरे, तीन-चार शौचालय, बंगले के चारो ओर एक-दो एकड़ की जमीन, उसमें फलदार वृक्षों की भरमार, मौसमी साग-सब्जियों की क्यारियाँ, रंग-बिरंगे फूलों की सदाबहार. चारो ओर हरा-भरा. गंदगी का नामोनिशान नहीं. इसके विपरीत सात-आठ सदस्य वाले सरकारी कर्मचारियों के लिए एक-दो या हद से हद तीन कमरों वाला रेलगाड़ी के डिब्बे की तरह एक-दूसरे से सटा मकान. एक ही शौचालय, सुबह के समय एक गया तो दूसरा उसके बाहर निकलने के इंतजार में अंदर-बाहर का चक्कर काट रहा है. कर्मचारियों के तमाम छोटे-छोटे बच्चे, वे बेचारे कहां जाएं सो सड़क के किनारे ही निपट लेते हैं. मुहल्ले में गंदगी का इतना ढ़ेर जिधर देखो उधर प्रदूषण. तो कोई मेरी तरह बुध्दिमान व्यक्ति उस मुहल्ले में मॉर्निंग वाक करके अपने रहे-सहे स्वास्थ्य का भी नुकसान करने क्यूं जाएगा. इसीलिए हम जैसे स्वास्थ्य के प्रति सचेतक लोग हमेशा आफिसर्स कालोनी में ही मॉर्निंग वाक करके अपने दिन की शुरूआत करना पसंद करते हैं. हां तो एक दिन मैं यूं ही आफिसर्स कालोनी में मॉर्निंग वाक के दौरान टहलते हुए अपने इष्ट मित्रो के साथ अपने दूर के रिश्तेदार डा. बद्री प्रसाद के बंगले की ओर चला गया. वहां देखा कि सुबह-सुबह डा. साहब के बंगले के बाहर काफी संख्या में मोटर साइकिलें, स्कूटर साइकिलें खड़ी हैं. वहां काफी लोग जमा हैं. मैं अनजानी आशंका से ग्रसित होकर वहां चला गया. लोगों से पूछने पर पता चला कि वे लोग डा. साहब को देखने नहीं बल्कि दिखाने आए हैं. सुनकर मन को काफी तसल्ली मिली. फिर देखा कि डा. साहब ने अपने मेनगेट पर एक सूचना चस्पा कर रखी थी. रोगी देखने का समय प्रात: 7.00 बजे से 8.30 बजे तक और सायं 6.30 बजे से 8.30 बजे तक. मेरा मन डा. साहब की इस मानव सेवा के प्रति लगन एवं भक्ति देखकर अगाध श्रध्दा के भाव से पूरी तरह भर गया. उनकी अपने पेशे के प्रति अटूट लगन देख कर मेरी आंखे श्रध्दा से छलछला गईं. मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया. और हो भी क्यूं . आखिरकार डा. साहब मेरे दूर के रिश्तेदार जो ठहरे. इतने दिनों के बाद आज मैंने अपने साथ टहलने वाले इष्ट मित्रो को बताया कि डा. साहब मेरे दूर के रिश्तेदार हैं. यह बताते हुए मैं अपने को कितना गौरवांवित महसूस कर रहा था इसको मापने के लिए कोई यंत्र नहीं था. टहलते-टहलते मैं सोचता जा रहा था कि डा. साहब कितना मेहनत करते हैं मानवता की सेवा के लिए. इनकी पूरी दिनचर्या कितनी व्यस्त रहती है. सुबह जल्दी सोकर उठना, तैयार होकर आधा-अधूरा नाश्ता करके रोगियों को देखने बैठ जाना. निर्धारित अवधि 8.30 बजे के बावजूद यदि रोगी अधिक होते हैं तो सभी को देखकर ही उठना चाहे अस्पताल पहुंचने में एक-डेढ़ घंटे भले ही देर क्यूं हो जाए. वहां भी रोगियों को निपटाना. इसी तरह अस्पताल से आने के बाद किसी तरह हाथ-मुंह धो-धाकर फिर अपनी जगह आकर रोगियों को देखना. रोगियों को निपटाते-निपटाते कब रात के नौ बज जाते पता ही नहीं चलता. इसे कहते हैं मानवता के सच्चे सेवक.

चूंकि मुझे अपने अन्य बन्धुओं के समान दूर की रिश्तेदारी को भुनाने की आदत होने के कारण मैं कभी डा. साहब से मिल सका. परन्तु इसे संयोग कहिए या दुर्योग, एक दिन अचानक मैं अपने को काफी अस्वस्थ महसूस कर रहा था तो मेरे एक मित्र, जिनके साथ मैं रोज मॉर्निंग वाक पर जाया करता था और उन्हें डा. साहब से अपनी दूर की रिश्तेदारी के बारे में भी बताया था, ने मुझे डा. साहब को दिखा देने की सलाह दी और मेरे मना करने के बावजूद जबरदस्ती अपनी गाड़ी पर बिठाकर सुबह-सुबह डा. साहब के बंगले पर ले गया. वहां पहले से ही करीब 10 मरीज या उनके रिश्तेदार लाइन में लगे थे. मेरे मित्र ने सलाह दी कि अपना परिचय देकर आउट ऑफ टर्न का लाभ उठाया जाए जैसा कि अन्य लोग बड़े धड़ल्ले से करते हैं. आजकल तो हर जगह परिचय वालों का बोलबाला है. आपका परिचय यदि राशनवाले से है तो आपको लाइन में लगने की जरूरत नहीं. रेलवे आरक्षण लिपिक से परिचय है तो लाइन में लगने की जरूरत नहीं. स्कूल में परिचय है तो फीस जमा करने की लाइन में लगने की जरूरत नही. परिचय क्या नही करा दे. सभी कार्य यदि परिचय है तो होना संभव है. यदि परिचय नहीं तो लगे रहिए लाइन में. परन्तु एक तो मेरा स्वभाव ऐसा नही कि परिचय का अनुचित लाभ उठाया जाए और दूसरे मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से दूसरे मरीजों को बुरा लगे. इसलिए मैंने अपने मित्र की सलाह को नजरअंदाज कर दिया. और वैसे भी मेरे मन में डा. साहब की जो मानवता के सेवक की मूरत विराजमान थी उसे मैं आउट आफ टर्न का लाभ लेकर कलंकित नही करना चाहता था. क्योंकि यदि मैंने अपने परिचय का लाभ उठाकर आउट ऑफ टर्न डा. साहब को दिखा दिया तो अन्य रोगियों के मन में डा. साहब के प्रति पक्षपात का आरोप लगने की संभावना थी. यही सब सोचकर मैं लाइन में सबसे पीछे लग गया. यह हमारे डा. साहब की सहृदयता का ही परिचायक था कि उन्होंने प्रतीक्षार्थियों के लिए 20-25 कुर्सियां लॉन में लगवा रखी थीं. उन्हीं एक कुर्सी पर सबसे पीछे मैं भी बैठ गया. डाक्टर साहब मरीजों को एक-एक करके बुलाते, उनका भौतिक परीक्षण करते, मुस्कराते हुए हाल-चाल पूछते और फिर सारे चेकअप एवं दवा आदि लिखते. जाते समय मरीज उनको मुट्ठी में दबा हुआ कुछ देता जिसे डा. साहब बड़े इत्मीनान के साथ अपनी जेब में सरका लेते. इस तरह का कार्यकलाप करीब पांच-: मरीजों के साथ देखकर मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने अपने से एक नम्बर आगे वाले मरीज से पूछा कि जाते समय मरीज डा. साहब को क्या देता है जो कि डा. साहब अपनी जेब में सरका लेते हैं ? उसने मुझे इस नजर से देखा कि जैसे मैं कोई अजूबा हूं या फिर जंगल से निकलकर अभी-अभी शहर में आदमियों के बीच आया हूं. फिर भी वह काफी सज्जन व्यक्ति था. क्योंकि उसने  मेरी इस उलजुलुल बात के लिए मुझे झिड़का नहीं बल्कि कोमल स्वर में कहा कि सभी मरीज डा. साहब को सौ रूपये का नोट फीस के रूप में देते हैं. मैंने फिर पूछा- क्यों? उसने थोड़ा झल्लाए हुए परन्तु धीमें स्वर में ही कहा कि बंगले पर रोगी को देखने के लिए डा. साहब प्रति विजिट सौ रूपये लेते हैं. यहां वे सभी से सद्व्यवहार से मिलते हैं अच्छी तरह देखते हैं. जबकि अस्पताल में यही डा. साहब किसी से सीधे मुंह बात नही करते हैं. रोगी जैसे ही इनके चैम्बर में घुसता है डा. साहब बिना उसको कुछ कहने का मौका दिए उसके मर्ज की दवा लिखकर पर्ची उसके हाथ में थमा देते हैं और दरवाजे पर बैठे चपरासी से कहते हैं- नैक्स्ट. यदि रोगी ज्यादा कुछ कहना चाहता है तो कहते हैं यहां फुरसत नहीं है बंगले पर आओ. अब जाओ मेरा भेजा मत खाओ. काफी मरीज देखना है. भईया मैं भी अस्पताल रिटर्न हूं. यहां बंगले पर दो बार दिखा चुका हूं और दोनो बार सौ-सौ के नोट देने पड़े हैं. यह डा. साहब के ही पुण्य प्रताप और नोट का प्रभाव है जो आज मैं थोड़ा स्वस्थ दिख रहा हूं.

मुझे उस व्यक्ति की बात पर यकीन ही नहीं हो रहा था और डा. साहब जैसे मानवता के सच्चे पुजारी के प्रति इस व्यक्ति के दोषारोपण पर मुझे गुस्सा भी रहा था. मुझे मालूम था कि सरकार ने सभी सरकारी डाक्टरों के निजी प्रेक्टिस पर रोक लगा रखी है और इसके एवज में उन्हें उनके वेतन का 25% एन.पी.. (नान प्रेक्टिस एलाउन्स) देती है फिर इन्हें मरीजों से फीस लेने की क्या आवश्यकता है. और वैसे भी हमारे डा. बद्री प्रसाद तो मानवता के सच्चे पुजारी है. फिर वे ऐसा घिनौना काम क्यों करेंगे. मैंने अपनी जिज्ञासा उसी सज्जन के समक्ष पुन: पेश की. उन्होंने अपने अनुभव से सींचे स्वर में कहा कि सिर्फ यही नहीं बल्कि कुछ को छोड़कर लगभग सभी सरकारी डाक्टर मानवता के सच्चे सेवक हैं, मृदुभाषी हैं, व्यवहार कुशल हैं सिर्फ बंगले पर दिखाने पर ही. अस्पताल के बहिरंग (.पी.डी.) में बिलकुल उलट हैं. मैं अभी भी उन सज्जन के अनुभव से सहमत नहीं था इसलिए मैंने एक और तीर छोड़ते हुए कहा कि क्या सरकार का भ्रष्टाचार निरोधक निगरानी तंत्र (सतर्कता विभाग) का भय इन्हें नहीं सताता. उन महाशय ने व्यंग्य से मुस्कराते हुए कहा- भईया यहां सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. हमारे निगरानी तंत्र को इसकी पूरी जानकारी है यह खेल कोई चोरी-छिपे थोड़े ही खेला जा रहा है बल्कि खुलेआम हो रहा है. उन्हें भी तो अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य की चिन्ता है. इसलिए जानते-बूझते हुए भी कुछ करने में असमर्थ हैं बेचारे. और वैसे भी सरकार का यह निगरानी तंत्र छोटे कर्मचारियों द्वारा किए जाने वाले भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए बना है कि बड़े अफसरों के लिए. इनकी चूहेदानियों में जानबूझ कर आवक छिद्र इतना छोटा रखा गया है जिससे केवल छोटे-छोटे चूहे ही जा सकें और फंस सकें. बड़े-बड़े चूहे इन चूहेदानियों में समा ही नहीं सकते इसलिए बाहर मजे लूटते रहते हैं. कभी-कभी सरकार द्वारा काफी दबाव बनाने पर इनको पकड़ने के लिए दिखावे के लिए चूहेदानियों का अविष्कार किया भी जाता है तो पीछे से बाहर निकलने के लिए बड़ा सा छेद जानबूझ कर छोड़ दिया जाता है, जिससे वे आराम से बेदाग बाहर निकल सकें.

खैर इसी बतकही में मेरा नम्बर भी गया. डा. साहब बड़े प्रेम से मिले, तकलीफ पूछी तो मैंने अपना पूरा हाल उन्हें बताया. उन्होंने बड़े धीरज से मेरी पूरी बात सुनी. आवश्यक भौतिक जांच-पड़ताल करने के पश्चात अस्पताल से किए जाने वाले सभी आवश्यक-अनावश्यक जांच यानी ख्ून से लेकर मूत्र तक और एक्सरे से लेकर ईसीजी अल्ट्रासाउण्ड तक लिख दिए. अस्पताल से प्राप्त होने वाली दवा भी लिख दी तथा जो दवा अस्पताल में उपलब्ध नही थी उसके लिए लोकल पर्चेज के लिए भी फार्म भर दिया. इतना सब हो जाने के पश्चात जब फीस देने की बारी आई तो मैंने उन्हें अपना परिचय देते हुए कहा आपकी बहन की शादी मेरे फलां रिश्तेदार के बेटे से हुई है. अत: आपसे मेरा रिश्ता काफी निकट का है. इस पर वे मुस्कराए और बोले - शर्मा जी, वो बात तो सब ठीक है पर मैं अपने प्रोफेशन के साथ दोहरा व्यवहार नहीं करूंगा. फीस तो आपको देनी ही पड़ेगी. आपको मालूम ही है कि मैंने अपनी मेडिकल की पढ़ाई बैंक से लोन लेकर की है. पूरा वेतन एन.पी. सहित बैंक का लोन भरने में चला जाता है. बंगले की कमाई से ही पेट पाल रहा हूं. इसमें भी अगर रिश्तेदारी निभाऊंगा तो खाऊंगा क्या. यह तो वही कहावत हो गई कि घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या. डा. साहब की यह करूण गाथा सुनकर मैं द्रवित हो गया. चूंकि मैं घर से यह सोचकर ही नहीं चला था कि डा. साहब को फीस भी देनी पड़ सकती है, इसलिए रूपये लेकर आया ही नहीं था. मेरा मित्र जो मेरे पास ही खड़ा था मैंने उसकी ओर याचना भरी दृष्टि से देखा उसने मेरी मंशा समझकर अपनी जेब से एक सौ का करारा नोट निकालकर डा. साहब को अर्पित किया. डा. साहब ने उसे लेकर अपनी के जेब के हवाले किया और मुझसे बोले- शर्मा जी, आपसे मिलकर बड़ी खुशी हुई कि चलो इस शहर में भी मेरा कोई रिश्तेदार है. आप एक हफ्ते बाद फिर यहीं आकर दिखा जाइएगा. अस्पताल में वैसे भी काफी भीड़ होती है. वहां आपको ही असुविधा होगी. साथ ही मैं आपको वहां ठीक से देख भी नहीं पाऊंगा. मैंने डा. साहब की मंशा समझकर हामी में सिर्फ सिर हिला दिया और भारी कदमों से बाहर निकल आया.


बाहर निकल कर मैंने अपने इष्ट मित्र से कहा कि देखो, आज की चर्चा किसी से भी मत करना. परन्तु उस सज्जन के पेट में पानी नहीं पचा और उसने सभी से मेरे इन दूर के रिश्तेदार के बारे में पूरी घटना की जानकारी नमक-मिर्च लगाकर बता दी थी. अब वे सब  मुझे अकसर छेड़ते रहते हैं और मैं छिड़ता रहता हूं. इस घटना के बाद मैं किसी भी बड़े अधिकारी को अपना दूर का रिश्तेदार बताने से कतराता हूं.
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