Friday, September 25, 2015

प्रगतिशील लेखकों ने प्रेमचंद की झूठी छवि उकेरी

प्रेमचंद गरीबी में पैदा हुए, गरीबी में जीये और गरीब ही मर गए, ऐसी छवि प्रगतिशील लेखकों ने प्रेमचंद जी की निरूपित की है. हमने भी प्रेमचंद पर आधारित कई संगोष्ठियों में वरिष्ठ साहित्यकारों, विश्वविद्यालय के हिंदी प्रोफेसरों के व्याख्यानों में प्रेमचंद की यही छवि पाई.

प्रेमचंद साहित्य के मर्मज्ञ और व्यास सम्मान प्राप्त डॉ. कमल किशोर गोयनका ने इसका खंडन करते हुए श्री रमण कुमार सिंह को दिए एक इंटरव्यू, जो दि. २६ सितम्बर, २०१५ के अमर उजाला मे प्रकाशित हुआ है, में कहा कि प्रगतिशीलों ने प्रेमचंद की झूठी छवि गढ़ी है. प्रेमचंद को अपने समकालीन लेखकों की तुलना में सबसे ज्यादा पारिश्रमिक मिलता था. जब वह फिल्म उद्योग के लिए लिए मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) गए थे, तो उनकी तनख्वाह ८००/- (आठ सौ रूपये) थी. उस समय सोना २०/- (बीस रूपये) तोला बिकता था. इससे गणना कीजिए कि उनके पास कितना पैसा था.
अगर हम तत्कालीन मूल्य और आज के मूल्य की तुलना करे-

उस समय. ८००÷२०=४० यानी ४० गुणा
इस समय सोना २७००० रूपये तोला है तो २७०००×४० = १०८०००० यानी दस लाख अस्सी हजार रूपये.

अगर किसी व्यक्ति के पास दस लाख अस्सी हजार है तो वो गरीब कैसे होगा. इस संबंध में कहीं न कहीं झोल तो है, यह तो वरिष्ठ ही बता सकेंगे.
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