Friday, September 25, 2015

प्रगति के लिए असंतोष होना आवश्यक है.

कहा जाता है-

गो धन गज धन बाजी धन और रतन धन खान,
जब आये संतोष धन सब धन धुरी समान.

यानी संतोष धन सबसे बड़ा धन है. संतोष करके अब बैठ जाना है. फालतू की भाग-दौड़, हाथ-पैर मारना बंद.

तो फिर आगे की प्रगति कैसे होगी. अगर सभी संतोष धन प्राप्त करके सन्नाटा मारकर बैठ जाएं.

मेरा तो मानना है कि सभी के पास असंतोष धन होना चाहिए, थोड़ा बहुत नहीं बल्कि प्रचुर मात्रा में होना चाहिए, क्योंकि बिना असंतोष के प्रगति हो ही नहीं सकती. जब तक आपमें असंतोष है आप जूझते रहेंगे, जिस दिन हममें संतोष आ गया उसी दिन से काम-धंधा बंद. प्रगति में ठहराव आ जाएगा. परन्तु इसके साथ ही यह भी स्पष्ट करना है कि यह असंतोष भ्रष्टाचारमुक्त असंतोष होना चाहिए. इस असंतोष में उनकी कड़ी मेहनत और पसीने की दरकार होनी चाहिए.

हमारे कई कार्यालयी मित्र हैं, जिनके पास प्रचुर मात्रा में संतोष धन है. अब उनमें सीखने की ललक नहीं. प्रगति की चाह नहीं. बिना काम किए जितना सरकार दे रही है, बहुत है.
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