Thursday, December 29, 2016

तदवीर और तकदीर

मेरे पिताजी मुझसे कहा करते थे कि तदबीर और तकदीर जब दोनों साथ काम करते हैं तभी व्यक्ति सफलता की सीढ़ी चढ़ता है. सिर्फ एक से काम नहीं बनता.इसका उदाहरण उन्होंने बड़ा सटीक दिया था. जिससे कम से कम मेरे दिमाग़ के सारे जाले तो साफ़ हो ही गए।
उन्होंने बैंक के लॉकर के उदाहरण दिया था. जिसकी दो चाभियाँ होती हैं. एक आप के पास होती है और एक मैनेजर के पास.
आप के पास जो चाभी है, वह है परिश्रम और मैनेजर के पास जो चाभी है, वह है भाग्य.
जब तक दोनों नहीं लगतीं ताला नहीं खुल सकता.
आप कर्मयोगी पुरुष हैं और मैनेजर भगवान है.
आपको अपनी चाभी लगाते रहना चाहिये. पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाभी लगा दे.
कहीं ऐसा न हो कि भगवान अपनी भाग्यवाली चाभी लगा रहा हो और हम परिश्रम वाली चाभी न लगा पाएं और ताला खुलने से रह जाए.
मैंने अपने पिताजी की बात गांठ में बांध ली है और अपनी चाभी लॉकर में लगाए रहता हूं. भगवान भी मुझपर मेहरवान रहता है और वह भी यथा-अवसर अपनी चाभी लगाकर मेरी सफलता का मार्गप्रशस्त करता रहता हैं.
मैंने तो अपने पिताजी की सीख गांठ बांध ली है. यदि आपको भी अच्छी लगे तो अपना सकते हैं.

Friday, November 18, 2016

नोटबंदी : एक बेहतर विकल्प पेटीएम

paytm wallet cashback offersकालेधन, आतंकवाद, नकली करेंसी पर लगाम लगाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री जी ने 500 एवं 1000 के प्रचलित नोट पर 08 नवम्बर,2016 रात 12 बजे से पाबंदी लगा दी। इसके बाद देश भर में आपाधापी मची हुई है। देखने में आया कि देश का पढ़ा-लिखा युवावर्ग भी बैंकों, एटीएम की लाइन में कैश निकालने में लगा हुआ है। जबकि उसके पास ऑनलाइन पेमेंट वॉलेट के कई विकल्प मौजूद हैं। इन्हीं में से पेटीएम! एक ऐसा नाम है, जो आजकल करीब हर किसी की ज़ुबान पर चढ़ा हुआ है और सबसे काम का साबित हो रहा है। टीवी, विज्ञापन, अखबार हो या सोशल मीडिया, आपको हर जगह पेटीएमकरो (#Paytmkaro) दिखाई या सुनाई पड़ जाएगा। नोट बंद होने के बाद देश के सबसे बड़े ऑनलाइन पेमेंट वॉलेट में शुमार पेटीएम के यूज़र में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। बाजार में नकदी की समस्या हो रही है और ऐसे में लंबी कतारों से बचने के लिए लोग पेटीएम वॉलेट का भरपूर फायदा ले रहे हैं।
मोबाइल बिल का रीचार्ज हो या बिल पेमेंट, टैक्सी के पैसे चुकाने हों या फिर मेट्रो कार्ड का रीचार्ज करना हो। पेटीएम पर आपकी हर समस्या का समाधान है। मूवी टिकट बुक करना हो, या फ्लाइट, होटल, हर किसी के लिए पेटीएम करें और लंबी लाइन से छुटकारा पाएं। लोग कैफे कॉफी डे या किसी मेडिकल शॉप पर भी भुगतान के लिए मोबाइल वॉलेट का इस्तेमाल किया जा सकता है। सीधे तौर पर कहें, तो मोबाइल वॉलेट का यह वो युग है जो अर्थव्यवस्था में बदलाव के साथ एक कैशलैस सोसायटी का निर्माण कर रहे हैं। आज हम आपको बताएंगे, पेटीएम क्या है? और आप इसका इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं?
क्या है पेटीएम वॉलेट
पेटीएम एक सेमी-क्लोज्ड वॉलेट है और इससे कोई कैश नहीं निकाला जा सकता। पेटीएम से कई अलग-अलग जगह (मर्चेट लोकेशन) पर सामान और सर्विस के लिए पेमेंट का भुगतान किया जा सकता है। पेटीएम की शुरुआत के वक्त इससे सिर्फ मोबाइल रीचार्ज, डीटीएच प्लान और बिल पेमेंट किया जा सकता था। इसके बाद फरवरी 2014 में कंपनी ने ई-कॉमर्स क्षेत्र में कदम रखा। पेटीएम के वॉलेट पार्टनर में उबर, बुकमायशो और मेकमायट्रिप समेत कई कंपनिया शामिल हैं। इसके अलावा शॉपिंग, ट्रैवल, एंटरटेनमेंट और फूड क्षेत्र की भी कई कंपनियों से पेटीएम की साझेदारी है।
पेटीएम में कई सारी कैटेगरी, बुक ऑन पेटीएम, रीचार्ज और पे फॉर, शॉप ऑन पेटीएम, ऑफर, ट्रेन टिकट, इलेक्ट्रिसिटी बिल, डीटीएच रीचार्ज, मोबाइल रीचार्ज, टुडेज़ बाजार समेत कई कैटेगरी मौज़ूद हैं। पेटीएम का अपना ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म भी मौज़ूद है।
हाल ही में नोट बंदी के बाद पेटीएम ने नया 'नियरबाय' फ़ीचर भी लॉन्च किया है। इसके जरिए आप अपने आसपास पेटीएम वॉलेट के जरिए पेमेंट लेने वाले दुकानदार को आसानी से खोज पाएंगे। इस फ़ीचर से उन ग्राहकों को मदद मिलेगी जिनके पास नकदी की कमी है। पेटीएम के 'नियरबाय' फ़ीचर में देशभर में मौज़ूद कंपनी के करीब 8 लाख से ज्यादा ऑफलाइन दुकानदार की डायरेक्टरी है। कंपनी ने ईमेल के जरिए एक बयान जारी कर बचाया कि पहले चरण के तहत करीब 2 लाख दुकानदारों को इस फ़ीचर में जोड़ दिया गया है।
पेटीएम का इस्तेमाल कैसे करें
पेटीएम इस्तेमाल करना बेहद आसान है। इसके लिए आपको लॉगइन करना होगा। इसके लिए आपको अपना मोबाइल नंबर और ई-मेल वेरिफिकेशन करने की जरूरत होगी। एक बार सफलतापूर्वक वेरिफिकेशन और लॉगइन करने के बाद पेटीएम की किसी भी सर्विस का फायदा लिया जा सकता है।
किसी भी सर्विस का तेजी से फायदा उठाने के लिए आप अपने डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड की डिटेल स्टोर कर सकते हैं। इसके अलावा नेट बैंकिंग का इस्तेमाल भी कर सकते हैं।
गौर करने वाली बात है, पेटीएम आईआरसीटीसी पर बुकिंग सपोर्ट करता है और इसके पास पेमेंट बैंक सेटअप के लिए आरबीआई का लाइसेंस भी है। इस लाइसेंस से पेटीएम करंट व सेविंग अकाउंट डिपॉजिट करने, डेबिट कार्ड जारी करने व इंटरनेट बैंकिंग सर्विस ऑफर करता है।
पेटीएम वॉलेट का इस्तेमाल कैसे करें
पेटीएम का इनबिल्ट वॉलेट भी है। इस वॉलेट को रीचार्ज कर बेहद कम समय में बिल भुगतान, किसी भी तरह के रीचार्ज को बिना देरी के किया जा सकता है। पेटीएम वॉलेट को डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, नेट बैंकिंग और आईएमपीएस मर्चेंट पेमेंट के जरिए रीचार्ज कर सकते हैं। पेटीएम वॉलेट में आपको पासबुक का फ़ीचर मिलेगा। जिसमें आपके सभी लेन-देन की जानकारी उपलब्ध रहता है। पेटीएम वॉलेट में पासबुक, रिडीम वाउचर, सेंड मनी, रिक्वेस्ट वॉलेट अपग्रेड चार फ़ीचर उपलब्ध हैं। पेटीएम वॉलेट से आप किसी को भी मोबाइल नंबर या बैंक अकाउंट के जरिए पैसे भेज सकते हैं। इसके अलावा पेटीएम पर मिलने वाले वाउचर रिडीम भी कर सकते हैं।
पेटीएम अपने स्मार्टफोन में डाउनलोड करने के लिए एक अच्छा और अब तो शायद सबसे काम का ऐप है। देशभर में फैले इसके पार्टनर की वजह से इसे इस्तेमाल करना आसान है। चाहें आपको उबर कैब बुक करनी हो या फूडपांडा से खाना ऑर्डर करना हो, पेटीएम है ना। पेटीएम अब अपनी ई-कॉमर्स साइट पर अच्छे ऑफर के साथ ग्राहकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। इसके अलावा पेटीएम पर आपक हर तरह के इलेक्ट्रॉनिक, होम अप्लायंस, फुटवियर भी कैशबैक ऑफर के साथ खरीद सकते हैं।
पेटीएम से मेट्रो कार्ड रीचार्ज की सुविधा भी है। दिल्ली व मुंबई मेट्रो के यात्री अब आसानी से बिना लाइन में लगे पेटीएम से ही मेट्रो कार्ड रीचार्ज कर सकते हैं। हर वीकेंड पर पेटीएम यूजर को वीकेंड बाजार समेत कई दूसरे प्रोडक्ट पर भारी डिस्काउंट भी देता है। 

Tuesday, September 13, 2016

हिंदी दिवस

मित्रों ! कल हिंदी दिवस हैं। कुछ संकल्प लेने-लिवाने का दिवस है। क्या ही अच्छा हो कि शुरूआत हम स्वयं से करें। जब हम स्वयं शुरूआत करेंगे तभी तो हम किसी दूसरे को कह सकते हैं। बहुत ही छोटे, पर महत्वपूर्ण, चीज पर आपका ध्यान आकृष्ट करता हूं, जिसे आप बेझिझक अपना सकते हैं, वह है सोशल मीडिया, यानी फेसबुक, व्हाट्सऐप, लिंक्डइन आदि में अपना प्रोफाइल नाम हिंदी (देवनागरी) में रखना।

फेसबुक, व्हाट्सऐप, लिंक्डइन आदि में मैंने अपना नाम तो हिंदी (देवनागरी) में लिख दिया है. आप कब शुरूआत करेंगे?

मित्रों ! हम बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं कि फलां होना चाहिए, डिकां होना चाहिए। पर छोटी-छोटी बातों को हम नजरंदाज कर देते हैं, जबकि वही महत्वपूर्ण होती है।

कल का इंतजार क्यों कर रहे हैं, आज ही, बल्कि मैं तो कहूं अभी अपने प्रोफाइल नाम को हिंदी (देवनागरी) कर दें. तभी कुछ सार्थक है. वर्ना बड़े-बड़े हिंदी के नामचीन समर्थक लोगों (जिन्होंने फेसबुक आदि पर अभी तक अपना प्रोफाइल नाम तक हिंदी में नही किया है) की तरह आप भी सबको हिंदी दिवस की बधाई देते रहिएगा, कौन क्या बिगाड़ लेगा।

Monday, September 12, 2016

औरत ही औरत की दुश्मन

जमाना बदल गया है, हम आधुनिक युग में जी रहे हैं। आज लड़की और लड़के में फर्क न के बराबर हो गया है। लड़कियों को भी अपने भाइयों के समान ही समान अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लड़कियां लड़कों से बाजी मार रही हैं। हर मोर्चे पर लड़कियों ने बुलंदी के झंडे गाड़ दिए हैं। फिर क्यों लड़कियों को कमजोर, अबला या निरीह समझा जा रहा है। ऐसी सोच किसकी है?
 
भारतीय समाज प्रारंभ से ही पितृसत्तात्मक सोच वाला रहा है। यहां वर्षों से पुरूषों का वर्चस्व रहा है। एक लड़की का बचपन पिता-भाई की छत्रछाया में, फिर विवाहोपरांत पति और बुढ़ापा पुत्र की छाया में रहता आया है। यह सोच क्या मात्र पुरूषों की थीनहीं! कहीं न कहीं इस सोच में परिवार या समाज की स्त्रियों का भी समर्थन प्राप्त था। इसमें कोई दो राय नहीं कि स्त्रियों ने परोक्ष रूप से पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बनाए रखने में अपना भरपूर समर्थन दिया था, बल्कि कहा जाए तो आज भी यही व्यवस्था लागू कर रखी है। ऐसा नहीं है कि ऐसी सोच सिर्फ गांव-देहात में विद्यमान है, बल्कि शहरी क्षेत्र में पॉश कालोनियों में रहने वाले हमारे पढ़े-लिखे कथित सभ्य समाज में भी ऐसी सोच देखी गई है। और तो और ये सोच महिलाओं में ही ज्यादा देखी गई है। औरत ही औरत की दुश्मन है- यह कहावत सच साबित होती है।

घर में बेटी के जन्म पर सबसे ज्यादा दुःखी होने वाला शख्स कौन? क्या दादा? क्या पिता? नहीं ! दुःखी होती है दादी, दुःखी होती है जन्म देने वाली मां। हम लाख प्रचार-प्रसार करा दें, स्लोगन छपवा दें- बेटी बचाओ- समाज बचाओ, जागो औरत जागो आदि, आदि। परन्तु हम सोच को कैसे बदलेंगे। सास-बहू, ननद-भाभी के रिश्ते जगजाहिर हैं। कभी ससुर-बहू या देवर-भाभी की वैमनस्यता देखी है?  नहीं ! देखा जाए तो एक औरत ही औरत की दुश्मन बनी हुई है। कभी सास के रूप में बहू को रात-दिन कोसना तो कभी बहू के रूप में पति की अनुपस्थिति में सास को गालियां देना, मारना-पीटना। यह हमें अक्सर दैनिक समाचार-पत्रों या टेलीविजन पर समाचार के माध्यम से देखने को मिल जाता है।

अभी हाल ही में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई, जब एक पढ़ी-लिखी सभ्रांत मां ने अपनी चार माह की अबोध बच्ची को चाकुओं से गोदकर सिर्फ इसलिए मार डाला, क्योंकि वह बेटी थी। जबकि उसके परिवार के पुरूष वर्ग को बेटी पैदा होने पर न तो अफसोस था और न ही कोई गिला-शिकवा। यह किस तरह की मानसिकता को दर्शाता है। उस अबोध बच्ची का क्या कसूर था? क्या यह कि वह लड़की थी? वह हत्यारी मां क्या किसी की बेटी नहीं रही थी? क्या उसने बेटी होकर भी उच्च शिक्षा-दीक्षा प्राप्त नहीं की थी? बेटे की चाह ने क्या उसे इस कदर अंधा बना दिया था कि उस मासूम की निर्मल मुस्कान उसे नहीं दिखी?


क्या सच में एक औरत ही औरत की दुश्मन होती है?

Saturday, September 10, 2016

धारा 370 मुक्त हो कश्मीर हमारा

मोदी जी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान धारा 370 का मसला व्यापक राष्ट्रीय हित में उठाया था, लेकिन उस पर अभी तक अमल नहीं हो पाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीर में धारा 370 हटाने के बाद राज्य की अधिकांश आबादी का विकास ही होगा जो अब तक मुख्यधारा से कटी हुई है।  
दरअसल, धारा 370 को लागू करते समय तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी ने देश को भरोसा दिलाया था कि यह व्यवस्था अस्थायी रहेगी, जो समय के साथ धीरे-धीरे स्वतः समाप्त हो जाएगी, लेकिन यह तो अब लगता है कि स्थायी हो गई है। अब तक किसी भी सरकार ने इसे हटाने का प्रयास करना तो दूर, सोचा तक नहीं।

तत्कालीन कानून मंत्री डॉ. भीमराव अम्बेडकर कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने शेख़ अब्दुल्ला को लताड़ते हुए साफ़ शब्दों में कह दिया था, "आप चाहते हैं, भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे, वह आपके यहां सड़कें बनाए, आपको राशन दे और कश्मीर का वही दर्ज़ा हो जो भारत का है! लेकिन भारत के पास सीमित अधिकार हों और जनता का कश्मीर पर कोई अधिकार नहीं हो। ऐसे प्रस्ताव को मंज़ूरी देना देश के हितों से दग़ाबाज़ी करने जैसा है और मैं क़ानून मंत्री होते हुए ऐसा कभी नहीं करूंगा।" 

यह नेहरू जी की पहल का परिणाम था कि कश्मीर को धारा 370 के अंतर्गत रखा गया। इस प्रावधान का डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने पुरज़ोर विरोध किया था। मुखर्जी ने नेहरू से कहा था कि आप जो करने जा रहे हैं, वह नासूर बन जाएगा और किसी दिन देश को विखंडित कर देगा। यह प्रावधान उन लोगों को मज़बूत करेगा, जो कहते कि भारत एक देश नहीं, बल्कि कई राष्ट्रों का समूह है।


आज घाटी में जो हालात हैं, उन्हें देखकर लगता है कि मुखर्जी की आशंका ग़लत नहीं थीधारा 370 के कारण ही राज्य मुख्यधारा से जुडऩे की बजाय अलगाववाद की ओर मुड़ गया। यानी जहां तिरंगे का अपमान होता है, बच्चों के हाथों में किताबों की जगह पत्थर पकड़ाए जाते हैं, देशविरोधी नारे लगाए जाते हैं, भारतीय सैनिकों की मौत की कामना की जाती है। इस धारा 370 का ही दुष्परिणाम है कि इस देश के अंदर ही कश्मीर एक मिनी पाकिस्तान बन गया है।


अब समय आ गया है कि इस धारा को हटाया जाए। अगर वाक़ई कश्मीर समस्या सदा के लिए हल करना है तो भारतीय संसद को ज़बरदस्ती इस धारा 370 को कूड़ेदान में डाल ही देना चाहिए। इसके लिए सरकार और विपक्ष में बैठे सभी लोगों को मिलकर करना होगा। यह बात कश्मीर के तथाकथित आकाओं को भी मालूम है कि पहले तो वे भारत से आजाद हो ही नहीं सकते, और यदि हो भी गए तो आजाद होकर सुखी नहीं रह सकते। यह उन्होंने पिछली बाढ़ से समय पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर की हालात को देखा ही है। अलगाववादी और दूसरे नेता यह अच्छी तरह से जानते हैं कि कश्मीर भारत से अलग नहीं हो सकता। लिहाज़ा, अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए आज़ादी का राग आलापते रहते हैं। भारत देश के पैसे पर पल रहे ये लोग, मलाई काट रहे हैं। अब समय आ गया है कि इनको मलाई खिलाना बंद किया जाए और उन्हें उनकी औकात में रहना सिखाया जाए। यह कार्य यदि मोदी सरकार में नहीं हुआ तो समझो कभी नहीं हो पाएगा।

Friday, August 26, 2016

एकता की शक्ति


हमारे यहां एक कहावत बहुत प्रचलित है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता परन्तु कई चने मिलकर भाड़ क्या पूरी भट्टी तोड़ सकते हैं। यानी एकता में अपार शक्ति होती है। जहां एकता है और जहां हम एक से दो हुए हमारी शक्ति दुगनी नहीं, कई गुना हो जाती है। हमें हर परिस्थिति में अपनी एकता को बनाए रखना है। इस बारे में दो दृष्टांतों के माध्यम से अपनी बात कहने की कोशिश करता हूं-
एक बार ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में इस एकता की अनोखी मिसाल देखने को मिली, जब एक आदमी की जान बचाने के लिए लोगों ने मिलकर ट्रेन को ही झुका दिया। यह हैरतअंगेज वाकया पर्थ के पास स्टर्लिंग रेलवे स्टेशन का है। स्टर्लिंग रेलवे स्टेशन पर ट्रेन में चढ़ते समय एक व्यक्ति का पैर फिसल गया। ट्रेन खड़ी थी और वह व्यक्ति प्लेटफॉर्म और ट्रेन के बीच बुरी तरह फंस चुका था। पहले तो एक-दो लोगों ने मिलकर उस व्यक्ति को निकालने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। ट्रेन में सवार लोगों को ट्रेन की दूसरी साइड खड़ा होने को कहा गया, ताकि व्यक्ति के पैर की ओर से ट्रेन थोड़ा भी ऊपर उठे तो उसे निकाला जा सके। लेकिन यह योजना भी विफल हो गई। इतने में ट्रेन के सभी यात्री नीचे उतर चुके थे। किसी यात्री ने ट्रेन को धक्का देकर थोड़ा तिरछा करने का सुझाव दिया। इसके बाद ट्रेन के सभी यात्री और रेल कर्मचारी मिलकर ट्रेन को धक्का देने में जुट गए। लोगों की सामूहिक ताकत ने असर दिखाया। कई हजार टन भारी ट्रेन दूसरी ओर ज्यों ही झुकी, उसके नीचे फंसे यात्री को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। यात्रियों की तत्परता से ही हादसे को रोक एक आदमी की जिंदगी बचाई जा सकी। इस पूरे रेस्क्यू मिशन के दौरान ड्राइवर को भी अलर्ट किया जा चुका था, ताकि वह ट्रेन चलाना ना शुरू कर दे। इस प्रकार सामूहिक बल से, एकता से असंभव कार्य भी संभव हो सका।
दूसरा दृष्टांत जंगल की एक कहानी के माध्यम से बताना चाहता हूं। भैंसों का एक झुंड अपनी मस्ती में चला जा रहा था। उस झुंड में एक बच्चा भैंसा भी था, जो काफी नटखट था। वह बार-बार अपने झुंड से अलग हो जाता था। एक बड़ा भैसा, जो शायद उसका पिता था, उसे बार-बार वापस झुंड में करता था। इससे बच्चा खीज गया और कहने लगा- क्या पिता जी, आप मुझे स्वछंद खेलने भी नहीं देते। इस जंगल में ऐसी कौन सी चीज है जिससे डरने की ज़रुरत है?
पिता भैंसा बोला- बेटा, जब तक तुम हमारे झुंड में हो, कोई खतरा नहीं है। बस झुंड से अलग न होना। सामने इन शेरों को देख रहे हो, बस इनसे सावधान रहना।

बच्चा बोला- अगर कभी मुझे शेर ने दौड़ाया तो मैं तेजी से दौड़ता हुआ भाग जाऊँगा।
पिता ने कहा- यही गलती मत करना।
बच्चे ने कहा- क्यों? वे तो बहुत खतरनाक होते हैं। मुझे मार देंगे तो। भला मैं भाग कर अपनी जान क्यों ना बचाऊं?
पिता ने कहा- यदि तुम भागोगे तो शेर तुम्हारा पीछा करेंगे। भागते समय वे तुम्हारी पीठ पर आसानी से हमला कर सकते हैं और तुम्हे नीचे गिरा सकते हैं। और एक बार तुम गिर गए तो तुम्हें कोई भी नहीं बचा सकता।
बच्चा घबरा गया। उसने पूछा- ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए?
पिता ने कहा- ऐसी स्थिति में अपनी जगह डट कर खड़े हो जाना और उसे ये दिखाना कि तुम जरा भी डरे हुए नहीं हो। उसे देखकर अपनी सींगों को हिलाना, नथुनों से तेज-तेज फुफकारना और खुरों को जमीन पर पटकना। अगर तब भी शेर ना जाएं, तो धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ना। और तेजी से अपनी पूरी ताकत के साथ उस पर हमला कर देना।
बच्चा नाराज होते हुए बोला- पिताजी, ये तो पागलपन है। ऐसा करने में तो बहुत खतरा है। अगर शेर ने पलट कर मुझ पर हमला कर दिया तो
पिता ने कहा- बेटे, अपने चारों तरफ देखो। तुम्हारे साथ तुम्हारा ताकतवर कुनबा है। कभी भी डरना नहीं। हम सब तुम्हारे साथ हैं। बस इतना याद रखना कि मुसीबत का सामना करने की बजायेतुम भाग मत खड़े होना, वरना हम तुम्हें नहीं बचा पाएंगे। और यदि तुम साहस दिखाते हो और मुसीबत से लड़ते हो तो हम मदद के लिए ठीक तुम्हारे पीछे खड़े होंगे। हमारी एकता के सामने शेर हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

सीख- यदि हम अपने परिवार की, समाज की एवं देश की एकता बनाए रखते हैं तो कोई भी बड़े से बड़ा कार्य आसानी से संपन्न कर सकते हैं। इसके साथ ही कोई दुश्मन भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। क्योंकि हमें मालूम है कि हमारा पूरा परिवार, समाज, देश हमारे पीछे खड़ा है। और यदि हम स्वार्थवश या किन्हीं कारणों से एकल हुए तो एक छोटा सा दुश्मन भी हमें हानि पहुंचा सकता है।  

Thursday, August 25, 2016

समस्या प्रबंधन

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामना...

आज हम समस्या प्रबंधन पर बात करते हैं। कृष्ण से बड़ा समस्या प्रबंधक कौन होगा? आप जानते हैं कि समस्या जीवन की सच्चाई हैं। संसार का कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं होगा जिसने अपने जीवन में कभी किसी समस्या का सामना नहीं किया हो। तो फिर आखिर समस्या से घबराना क्यों? यह बात सभी को मालूम है कि जिस प्रकार से कोई ताला बगैर चाबी के नहीं बनाया जाता उसी प्रकार से ईश्वर ने कोई भी समस्या बगैर उसके समाधान के नहीं बनाया है। और यह भी सही है कि यदि किसी समस्या को सुलझाया जा सकता है तो फिर चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है और यदि किसी समस्या को सुलझाया नहीं जा सकता तो फिर चिंता करने से क्या लाभ है? यानी किसी भी परिस्थिति में चिंता करने की कोई जरूरत ही नहीं है। उसका समाधान अवश्य है, सिर्फ उसे ढूंढने की आवश्यकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात कि किसी भी समस्या को बड़ा न होने दें, उसका समाधान ढूंढे और सामना करें, तो आप पाएंगे कि समस्या छोटी होती गई और अंततः समाप्त हो गई।

आइए, इस संबंध में कृष्ण की एक कहानी के माध्यम से आपको समस्या प्रबंधन का गुर बताने का प्रयास करता हूं- एक बार श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई श्रीबलराम के साथ जंगल में किसी काम से गए थे। चलते-चलते काफी दूर निकल जाने के बाद शाम हो गई। श्रीकृष्ण ने भईया से कहा अब वापस चलते हैं। वापस लौटने में रात हो गई। अमावस्या की रात थी। हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। श्रीकृष्ण ने कहा कि आज रात यहीं कहीं बिताया गया। तय हुआ कि एक बड़े पीपल के पेड़ के नीचे रूका जाए। श्रीकृष्ण ने कहा कि भईया घना वन है, जंगली पशुओं का खतरा है, हम बारी-बारी से पहरा देंगे। पहले आप सो जाइए, मैं पहरा दूंगा। जब मुझे नींद आएगी तो जगा लूंगा। बलरामजी बड़े भाई होने के नाते बोले- नहीं, पहले तुम सो जाओ, जब मुझे नींद आएगी तो जगा लूंगा। परस्पर सहमति बनी। श्रीकृष्णजी सो गए। रात और गहराई। बलरामजी जी जग रहे थे। इतने में उसी पीपल के पेड़ से एक भयंकर दानव उतरा और भयानक आवाज निकालने लगा। चूंकि बलरामजी बलवान योद्धा थे, डरे नहीं। फिर दानव ने भयंकर आवाज में दहाड़ मारी उससे बलरामजी थोड़ा सहम गए। उसी समय एक अप्रत्याशित घटना घटी। बलरामजी के सहम जाने से दानव का शरीर बड़ा हो गया और बलरामजी का कद छोटा हो गया। अब तो दानव और जोर-जोर से दहाड़ने लगा। बलरामजी भयभीत होने लगे। इससे उनका कद शनै-शनै छोटा होता गया और दानव का शरीर उसी अनुपात में बड़ा होता गया। इधर श्रीकृष्ण जी मानो घोड़े बेचकर सो रहे थे या उनकी माया थी। बलरामजी को मूर्छा आने लगी, उन्होंने किसी तरह कृष्ण को हिला-डुलाकर जगाया और स्वयं मूर्छित होकर गिर पड़े। श्रीकृष्ण जी नींद से जागे तो देखा कि बलराम जी गिरे पड़े हैं। उन्होंने सोचा कि शायद बलराम जी को नींद आ रही थी इसीलिए मुझे जगाकर सो गए हैं।
श्रीकृष्ण जी अब पहरे पर लग गए। कुछ समय पश्चात पुनः वही दानव फिर प्रकट हुआ और श्रीकृष्ण को डराने के उद्देश्य से दहाड़ लगाने लगा। श्रीकृष्ण बिना भयभीत हुए मुस्कराने लगे। अब तो दानव और जोर-जोर से दहाड़ने लगा। वह जितना दहाड़ता, क्रोध करता, उतना श्रीकृष्ण शांत चित्त से मुस्कराते। इससे दानव का शरीर छोटा होता गया, एक समय वह इतना छोटा हो गया कि श्रीकृष्ण ने उसे अपनी धोती में ही खोंस लिया।
सुबह चिड़ियों के चहचहाने की आवाज सुनकर बलराम जी की आंख खुली। सूर्य की किरणें छन-छनकर घने वन को आलोकित कर रही थी। आंख मलते हुए बलराम जी ने रात की घटना श्रीकृष्ण को बयान की। श्रीकृष्ण ने बलराम को अपनी धोती में बंधे दानव को दिखाते हुए कहा कि क्या यही वह दानव है? जिससे आप भयभीत हो गए थे। बलरामजी ने देखा कि यह तो वही दानव है परन्तु यह इतना छोटा कैसे हो गया। श्रीकृष्ण से कारण पूछने पर उन्होंने कहा कि हां, यही वह दानव है। जिससे आप भयभीत हो गए थे। आप जिससे भयभीत हो जाएंगे वह आपको डराता जाएगा, उसका कद बड़ा होता जाएगा। जहां आपने उसका सामना किया और आप भयभीत नहीं हुए, उसका कद अपने आप छोटा होता जाएगा। यही प्रकृति का नियम है।
सीख- किसी भी समस्या का समाधान करने के लिए सबसे पहले आपका चित्त शांत होना चाहिए। क्रोध में आकर या भयभीत होकर किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। साथ ही हम यह भी जानते हैं कि दुनिया की ऐसी कोई समस्या नहीं है, जिसका समाधान उपलब्ध न हो, हमें सिर्फ उसे तलाशने आवश्यकता है।

Tuesday, August 16, 2016

सोशल मीडिया और हम

सोशल मीडिया से आज कौन अपरिचित होगा? आज सोशल मीडिया, संवाद का वह सशक्त माध्यम बन गया है, जिससे हम दुनिया के किसी भी कोने में बैठे उन लोगों से संवाद एवं विचार-विमर्श कर सकते हैं, जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है। इसके जरिए हमें एक ऐसा साधन मिला है, जिससे हम न केवल अपने विचारों को दुनिया के समक्ष रख सकते हैं, बल्कि दूसरे के विचारों के साथ-साथ दुनियाभर की तमाम गतिविध्यिों से भी अवगत होते हैं। सोशल मीडिया सामान्य संपर्क या संवाद ही नहीं, बल्कि हमारे कैरियर को तराशने एवं नौकरी तलाशने या लेखन प्रसार में भी पूरी सहायता उपलब्ध कराता है।

एक वह भी जमाना था, जब हम कबूतरों के जरिए सूचनाओं का आदान-प्रदान करते थे, फिर कबूतरों का स्थान पत्रवाहकों ने ले लिया और क्रमशः डाकियों के जरिये पत्र भेजकर सूचनाओं का आदान-प्रदान करते थे। पत्र को भेजने और उसका उत्तर प्राप्त करने में हमें महीनों लग जाते थे। लेकिन आज..., आज सूचना क्रांति ने हमें सात समुंदर पार बैठे लोगों से भी सीधे बात करने की सुविध उपलब्ध करा दी है। हम अपने घर-परिवार, हित-मित्रों के हाल-चाल से उन्हें तत्काल अवगत करा सकते हैं। इसे यदि एक वाक्य में कहा जाए तो आज पूरी दुनिया विश्वग्राममें परिवर्तित हो चुकी है और इसका पूरा श्रेय सूचना क्रांति को जाता है। इसी सूचना क्रांति से सोशल मीडिया का जन्म हुआ है।

पिछले दो दशकों में हम देखें तो इंटरनेट आधरित सोशल मीडिया ने हमारी जीवनशैली को बदलकर रख दिया है। हमारी जरूरतें, हमारी कार्य प्रणालियां, हमारी रुचियां-अभिरुचियां और यहां तक कि हमारे सामाजिक मेल-मिलाप, वैवाहिक संबंधों का सूत्रधार भी किसी हद तक सोशल मीडिया ही है। सोशल नेटवर्किंग या सामाजिक संबंधों के ताने-बाने को रचने में इसकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। इसके जरिये हम घर बैठे दुनिया भर के अनजान और अपरिचित लोगों से सामाजिक, राजनीतिक एवं आंतरिक संबंध बना रहे हैं। ऐसे लोगों से हमारी गहरी छन रही है, अंतरंग संवाद हो रहे हैं, जिनसे हमारी वास्तविक जीवन में कभी मुलाकात ही नहीं हुई है। इतना ही नहीं, हम इसके माध्यम से अपने स्कूल-कालेज के उन पुराने दोस्तों को भी खोज निकाल रहे हैं, जिनके साथ हम कभी पढ़े-लिखे, बड़े हुए और फिर वे धीरे-धीरे कर्तव्य दायित्व के बोझ तले दुनिया की भीड़ में कहीं खो गए।

दरअसल, इंटरनेट पर आधरित संबंध-सूत्रों की यह अवधरणा यानी सोशल मीडिया को संवाद मंच के तौर पर माना जा सकता है, जहां हम जैसे तमाम ऐसे लोग, जिन्होंने वास्तविक रूप से अभी एक-दूसरे को देखा भी नहीं, परन्तु एक-दूसरे से बखूबी परिचित हो चले हैं। आपसी सुख-दुख, पढ़ाई-लिखाई, मौज-मस्ती, काम-धंधे की बातों के साथ-साथ सपनों की बातें भी हममें होती हैं।

दुनियाभर में लगभग 200 सोशल नेटवर्किंग साइटें हैं जिनमें फेसबुक, ट्वीटर, आरकुट, माई स्पेस, लिंक्डइन, फ्लिकर, इंस्टाग्राम (फोटो, वीडियो शेयरिंग साइट) सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक दुनियाभर में करीब 1 अरब 28 करोड़ फेसबुक प्रयोक्ता हैं। वहीं, इंस्टाग्राम के 15 करोड़, लिंक्डइन के 20 करोड़, माई स्पेस के 3 करोड़ और ट्वीटर के 9 करोड़ प्रयोक्ता हैं। कहा जाए तो सोशल मीडिया के क्षेत्र में फेसबुक सबसे अग्रणी है।

सोशल नेटवर्किंग साइट युवाओं की जिंदगी का एक अहम अंग बन गया है। अगर सही मायने में देखा जाए तो आज का दौर युवाशक्ति का दौर है। इसके माध्यम से वे अपनी बात सशक्त तरीके से देश और दुनिया के हर कोने तक पहुंचा सकते हैं। कहा जाता है कि भारत युवाओं का देश है। भारत में इस समय 65 प्रतिशत के करीब युवा हैं जो किसी और देश में नहीं हैं और इन युवाओं को जोड़ने का काम सोशल मीडिया कर रहा है। युवाओं में सोशल नेटवर्किंग साइट का क्रेज दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है, जिसके कारण आज सोशल नेटवर्किंग दुनिया भर में इंटरनेट पर होने वाली नंबर वन गतिविधि बन गया है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार भारत के शहरी इलाकों में प्रत्येक चार में से तीन व्यक्ति सोशल मीडिया का किसी न किसी रूप में प्रयोग करते हैं। अब तो भारत के गांवों में भी सोशल मीडिया का क्रेज दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है।

एक वह भी जमाना हमने देखा है, जब लेखन कार्य के क्षेत्र में कुछ गिने-चुने लोगों का ही वर्चस्व था, परन्तु सोशल मीडिया ने आज आम जन-सामान्य को भी लेखन कार्य से जोड़ दिया है। आज पत्रकारिता करने के लिए इसकी औपचारिक डिग्री की आवश्यकता नहीं रह गई है। सोशल मीडिया पर आज प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र पत्रकार हो गया है। वह अपने आस-पास घटित घटनाओं पर अपने स्वतंत्र विचार रखने के लिए इस मंच का भरपूर उपयोग कर रहा है। हम पर सोशल मीडिया का प्रभाव बहुत ही गहरा हुआ है। अब हम ज्यादा सोचने-समझने और सपने देखने लगे हैं और उन सपनों को सोशल मीडिया के जरिए पूरा करने का प्रयास करते हैं। सोशल मीडिया जहां एक तरफ हमारे सपनों को एक नयी दिशा दे रहा है वही दूसरी ओर उन्हें साकार करने के लिए माध्यम भी उपलब्ध करा रहा है। ब्लॉगिंग के जरिए जहां हम अपनी समझ, ज्ञान और भड़ास निकालने का काम कर रहे हैं, लिंक्डइन पर प्रोफेसनलों से जुड़कर हम अपने कैरियर को नई ऊंचाई दे रहे हैं। वहीं सोशल मीडिया साइट के जरिए दुनिया भर में अपने समान मानसिकता वालों को जोड़कर सामाजिक सरोकार-दायित्व को पूरी तन्मयता से पूरा करने में संलग्न हैं।

अब सोशल मीडिया के रूप में आम आदमी को ऐसा टूल मिल गया है जिसके जरिये वह अपनी बात एक बड़ी आबादी तक सुगमतापूर्वक पहुंचा सकता है। इसे सोशल मीडिया की लोकप्रियता ही कहा जाए कि आज आम आदमी से लेकर खास आदमी भी इससे जुड़ा हुआ है। हमने देखा है कि कभी कंप्यूटर का भारी विरोध करने वाले वामपंथी नेताओं को भी पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान फेसबुक पर आना पड़ा था। एक वरिष्ठ माकपा नेता का कहना है कि लोगों से संवाद करने के लिए सोशल मीडिया एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उनका कहना है, सोशल मीडिया आज बहुत ही जरूरी माध्यम हो गया है। इसके जरिये एक बड़ी आबादी से अपने विचार साझा किये जा सकते हैं। पिछले एक दशक में इस माध्यम का कापफी विस्तार हुआ है। हालांकि वे मानते हैं कि राजनीति और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जनता से सीधे संपर्क साधना चाहिए न कि परोक्ष माध्यम के जरिये। उन्होंने कहा, सोशल मीडिया के जरिये लोगों से संपर्क तो हो सकता है लेकिन उनकी समस्याओं के बारे में पता नहीं चल सकता है।

एक बात तो तय है कि जो वरदान है, वही अति होने पर अभिशाप भी बन जाता है। आपको याद होगा, जब हम स्कूल में पढ़ते थे, तो लगभग प्रत्येक विद्यार्थी को हिंदी में हो या अंग्रेजी में, एक निबंध तो अवश्य ही तैयार करना होता था कि विज्ञान वरदान है या अभिशाप। यह निबंध परीक्षा में अवश्य ही पूछा जाता रहा है। निबंध का उपसंहार लिखते समय हम अपनी बात यह कहकर समाप्त करते थे, कि विज्ञान हमारे जीवन में तभी तक बहुत ही उपयोगी है, जब तक कि उसका सही इस्तेमाल किया जाए। जहां इसकी अति हुई वहीं से विनाश होना संभाव्य हो जाता है। यही बात सोशल मीडिया के ऊपर भी लागू होती है। यदि सोशल मीडिया का इस्तेमाल सकारात्मक रूप में किया जाए तो यह उपयोगी है और यदि इसका इस्तेमाल नकारात्मक रूप में किया जाए तो यह विनाशी और प्रलयंकारी होने में क्षण भर नहीं लगाता। कई सर्वेक्षणों में भी यह बात सामने आ रही है कि सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव लोगों के जीवन को बरबाद कर रहा है, कई ऐसी खबरें भी आईं हैं कि फेसबुक के कारण बहुत सारे लोगों के वैवाहिक संबंधों में दरार आ रही है। दुनिया भर में आए इन बदलावों में सोशल मीडिया खासकर ट्विटर और फेसबुक ने अहम भूमिका निभाई है। फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग फेसबुक के अपने खास पफीचर और उपयोगकर्ताओं की संख्या के लिए पहले ही बहुत मशहूर हैं, लेकिन अब दुनिया के इतिहास में बड़ा बदलाव लाने के लिए उनका नाम याद किया जाएगा। एक ऐसा व्यक्ति जिसने दुनिया भर के कई मुल्कों में बगैर किसी घातक हथियार के जनक्रांति की बयार बहा दी। इस बयार में कई मुल्कों में सत्ता पर लंबे समय से कब्जा जमाए हुए लोग हाशिए पर चले गए। इन क्रांतियों में जनता ने अभिव्यक्ति को आवाज देने के लिए फेसबुक का सहारा लिया। आने वाले सालों में जब क्रांतियों का इतिहास खंगाला जाएगा तो उसमें साइबर युग नाम का एक नया अध्याय अवश्य जुड़ा होगा।

गौरतलब है कि सोशल मीडिया के ये प्लेटफार्म न सिर्फ व्यक्तिगत जानकारियों के लिए ही प्रयोग में लाए जाते हैं बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मामलों में भी इनका प्रयोग हो रहा है। आपने देखा होगा कि सशक्त लोकपाल बिल की मांग कई दशकों से चली आ रही थी, लेकिन अन्ना हजारे के नेतृत्व में जिस तरह से भारत में इसकी मांग ने जोर पकड़ी और उसमें लोगों का जनसमर्थन मिला, वह तो चौंकाने वाला ही था। इंटरनेट पर यह आंदोलन बहुत ही तेजी से फैला। यू-ट्यूब पर अन्ना के इस अहिंसक संघर्ष को लाखों लोगों ने देखा। ट्विटर की दुनिया में भी इस क्रांति का तहलका मचा हुआ था। भारी संख्या में खासो-आम और आम आदमी के ट्वीट इस आंदोलन के समर्थन में आ रहे थे। सोशल मीडिया के माध्यम से ही अन्ना के इस आंदोलन को पूरी दुनिया में फैले भारतीयों और विदेशियों का समर्थन मिला। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2012 में देश की राजधानी दिल्ली में हुए निर्भया कांड में कैसे लोग दोषियों को सजा दिलाने के लिए एकजुट होकर उठ खड़े हुए थे। इसका पूरा प्रभाव पूरे देश में देखने को मिला था और यह सोशल मीडिया का ही कमाल था।

16वीं लोकसभा चुनाव के दौरान भी हमने देखा कि किस तरह विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने सोशल मीडिया का उपयोग किया, परन्तु जिस तरह नरेन्द्र मोदी जी की अगुआई में भाजपा ने सोशल मीडिया का उपयोग किया और जिस तरह भाजपा के खाते में बम्पर जीत आई, वह विस्मयकारी थी। मोदी जी ने फेसबुक, ट्विटर और यू-ट्यूब के जरिए जिस तरह लोकप्रियता हासिल की, वह एक नया इतिहास बना। लोग उनके फेसबुक पर पोस्ट की गई बातों और तस्वीरों को पोस्ट करते, प्रतिक्रिया देते और उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगाते। हमारे पीएम मोदी जी यह जानते हैं कि यदि लोगों से जुड़ना है तो सोशल मीडिया एक सशक्त माध्यम हो सकता है। इसी कारण वे आज भारत के नागरिकों एवं अप्रवासी लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं।


नकारात्मक एवं सकारात्मक सोच के लोग इसी समाज में रहते हैं। हमें सोशल मीडिया का इस्तेमाल किस सोच के साथ एवं कैसे करना है, यह हमें ही तय करना है। परन्तु इतना जरूर याद रखें कि सोशल मीडिया को इस्तेमाल करते वक्त हम सबको थोड़ी सावधनियां जरूर बरतनी होगी। कहीं ऐसा न हो जाए कि अति हो, क्योंकि अति सर्वत्र वर्जयेत।

Wednesday, August 3, 2016

दरकते रिश्ते


सच! कितना अपनापन और आत्मिक स्नेह था उस दौर में! जब हमारी चिंता हमारी न होकर पूरे परिवार की बन जाती थी और हम सब मिलकर सहयोग से उसको दूर करने का प्रयास करते थे। उस समय में रिश्तों में कितना अपनापन था और हम रिश्ते को निभाते थे ढोते नहीं थे।
उस समय में हम रिश्तों को बोझ नहीं समझते थे बल्कि रिश्तों की जरूरत समझते थे और ऐसा मानते थे कि रिश्तों के बिना जीवन जीया ही नहीं जा सकता। लेकिन आज इस बदलते दौर ने और आपाधापी के समय ने इस सारी व्यवस्था को बदलकर रख दिया है। अब वह दौर नहीं रहा। आज हमारे परिवार छोटे हो गए हैं और हम सब लोग स्वकेंद्रित होकर जी रहे हैं। पहले हम पूरे परिवार के लिए जीते थे, पर आज सिर्फ अपने-अपने बीवी-बच्चों के लिए ही जीते हैं। वही हमारा परिवार बन कर रह गया है। हमें अपनी अपनी बीवी-बच्चों के अलावा किसी और का सुख और दुख नजर नहीं आता। हम अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ इसी उधेड़बुन में लगा देते हैं कि कैसे अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं दें और कैसे अपने आपको समाज में प्रतिष्ठित बनाएं।

आपाधापी के इस दौर में जीवन से संघर्ष करते हुए हम आज रिश्तों को भूल गए हैं। आज हमारे बच्चों को अपने ताऊ, चाचा, बुआ, मामा, मौसी के लड़के-लड़की अपने भाई-बहन नहीं लगते। उन्हें इन रिश्तों की मिठास और प्यार का अहसास ही नहीं हो पाता है, क्योंकि कभी उन्होंने इन रिश्तों की गर्माहट को महसूस किया ही नहीं।
 
हम यह क्यों भूल जाते हैं कि पहले जब हम संयुक्त परिवार में रहते थे तो घर-द्वार की सारी चिन्ता छोड़कर हफ्तों-महीनों सैर-सपाटे पर निकल जाते थे और आज हम जब से एकल परिवार वाले हुए हैं, एक दिन के लिए भी घर छोड़कर जाने के लिए महीनों माथापच्ची करते हैं। 

कल को हमारे ये बच्चे भी हमें और अपने भाई-बहनों को पराया समझेंगे और इन रिश्तों को बोझ ही समझेंगे, क्योंकि किसी ने यह सही कहा है कि जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे.