Thursday, July 21, 2016

मेरी बृजमनगंज यात्रा

एक विवाहोत्सव के निमंत्रण पर हमें, मतलब हम पांच दोस्तों यानी दिलीप, विकास, राजकुमार, हेमंत और मुझे बृजमनगंज जाने का अवसर प्राप्त हुआ. हमने प्लान बनाया कि हम अपने निजी साधन से बृजमनगंज जाएंगे, मेजबान को कष्ट नहीं देंगे. अपना साधन होगा तो मस्ती भी अपने मन की रहेगी. कोई बंदिश नहीं रहेगी. इसके लिए हमने मुहल्ले के ही भाड़े पर गाड़ी चलाने वाले गाड़ी मालिक सह ड्राइवर परवेज आलम से बात की. परवेज भाई काफी मिलनसार और खुशमिजाज व्यक्ति है. हमने इससे पूर्व भी कई बार उनकी गाड़ी का उपयोग किया हुआ है. इनके साथ सफर का पता ही नहीं चलता. तय हुआ कि हम सुबह दस बजे तक यहां से यानी अपने घर, हनुमंतनगर कालोनी, पादरी बाजार से बृजमनगंज के लिए चल देंगे. निश्चित समय पर गाड़ी हमारे दरवाजे पर लग गई, पर हमारे मित्र राजकुमार और विकास को सजने-संवरने में टाइम लग रहा था. इतना समय तो औरते भी नहीं लेती हैं. लग रहा है यही लोग दुल्हा बनेंगे क्या?  किसी तरह होते-हबाते 10.30 बजे हम यहां से प्रस्थान कर सके. अरे ! एक बात तो मैं बताना भूल ही गया कि बृजमनगंज हमारे घर से मात्र 65 किमी. की दूरी पर है यानी कुल मिलाकर हद से हद डेढ़- दो घंटे का सफर है और इसके लिए हमें सुबह ही क्यों निकलना पड़ा, जबकि बारात तो बारात तो शाम को निकलनी है. इसका कारण भी हमारे मित्र विकास भाई रहे. प्रस्थान की पूर्व संध्या पर हम सब मित्रगण पूर्व की भांति इकट्ठा हुए और अगले दिन के कार्यक्रम पर विचार-विमर्श करने लगे तो इसके दौरान विकास भाई ने कहा कि हम आपको शाम को चार-पांच बजे के करीब कैम्पियरगंज चौराहे पर मिलेंगे और वहीं से आप लोगों को ज्वाइन करेंगे. पूछा गया कि ऐसा क्यों? उन्होंने कहा कि हमें सुबह ही आवश्यक काम से अपनी ससुराल मेहदावल जाना है. मेहदावल कैम्पियरगंज से 15 किमी दक्षिण दिशा में है. हमारे ग्रुप के सबसे हसौड़ और चुलबुले दिलीप ने चुटकी ली और कहा कि हम सब भी तो आपके साथ ही आपके ससुराल चल सकते हैं. बेचारे विकास ! क्या कहें. कोई चारा नहीं था. पिंड छुडाएं भी तो कैसे  अपने इन नामुराद दोस्तों से? अंत में उन्हें हथियार डालना ही पड़ा. तय हुआ कि साथ-साथ सभी पहले विकास भाई की ससुराल मेहदावल चलेंगे. दोपहर में उनके ससुराल में छनेगी और शाम को बृजमनगंज की बारात में.
करते-कराते, होते-हबाते हम सब 10.30 बजे अपने निवास हनुमंतनगर कालोनी से बृजमनगंज की ओर निकल पड़े. बृजमनगंज गोरखपुर-सौनोली सड़क मार्ग (एनएच 29) पर आनंदनगर के निकट है. वैसे बृजमनगंज पूर्वोत्तर रेलवे के लखनऊ मंडल का एक छोटा स्टेशन भी है. हम चाहते तो पैसेंजर ट्रेन से भी बृजमनगंज जा सकते थे. लेकिन यह हमें सूट नहीं कर रहा था. इसीलिए हम लोगों ने सड़क मार्ग का रास्ता चुनना बेहतर समझा. परवेज भाई ने गोरखपुर जेल रोड से बरगदवां बाईपास पकड़ा और सीधे बरगदवां जाकर गोरखपुर-सौनोली मार्ग पर आ गए. रास्ते में मानीराम से आगे परवेज भाई ने कहा- साहब, यहां का एक ढाबा अपनी चाय के लिए बड़ा मशहूर है. जब भी हम सवारी लेकर निकलते हैं यहां की चाय जरूर पीते हैं. हम लोगों ने कहा- चलो, फिर वहीं रोकना. बाकई उस ढाबे की चाय काफी स्वादिष्ट रही. वैसी स्वादिष्ट चाय बहुत कम ही पीने को मिलती है. हम लोगों ने वहां चाय तो पी ही साथ में छोले-टिक्की का भी आनंद लिया. खाने-पीने के बाद हमारा आगे का सफर शुरू हुआ. परवेज भाई एक कुशल ड्राइवर हैं. वह सऊदी अरब हो आए हैं. वहीं की कमाई से उन्होंने अपनी खुद की टाटा सूमो खरीदी, मुहल्ले में घर बनाया और आज परिवार के साथ रह रहे हैं. मुहल्ले वाले सब यही जानते हैं कि परवेज भाई अरब से बहुत कमा कर आए हैं. पर अंदरखाने की बात वही जानें. परवेज भाई ने बताया कि वे सऊदी अरब में भी ड्राइवरी किया करते थे. शेखों और उनकी बेगमों-बच्चों की गाड़ी चलाते थे. रास्ते में हम लोगों द्वारा कुरेदने पर उन्होंने अपने अरब प्रवास के अनुभव बताए.
परवेज भाई ने कहा- साहब, अपने घर में मिलने वाली आधी रोटी किसी अजनबी देश में मिलने वाली पूरी रोटी से बेहतर है. उन्होंने कहा कि सऊदी अरब में भारतीय कामगार जानवरों की तरह खरीदे-बेचे जाते हैं. जो जानवरों की तरह हाड़-तोड़ मेहनत-मशक्कत करते हैं. वे कमा-कमा कर घर भेजते हैं और घर वाले खुश होते हैं कि हमारा पति-बेटा-भाई अरब में कमा रहा है, पर इसकी कीमत उसे किस तरह चुकानी पड़ती हैं यह तो वो ही जानते है. परवेज भाई ने कहा कि वे अपने दोस्तों-रिश्तेदारों से कर्ज लेकर एजेंट के माध्यम से अरब गए थे. वे खुशकिस्मत रहे कि उन्हें वहां ड्राइवरी का काम मिला और उनका मालिक बहुत दयालु था. पर सभी मालिक इतने दयालु नहीं होते हैं. उन्हें पता चला कि उनके दूर के रिश्ते का बहनोई भी ड्राइवरी के लिए यहां आया है तो वे उनके पते पर गए तो देखा कि उनका कथित बहनोई पसीने से तर-बतर खजूर के पेड़ पर चढ़ा खजूर तोड़ रहा था. पूछने पर उन्होंने भीगी आंखों, रूध्े कंठ से बताया कि यहां रहने का कोई मतलब ही नहीं है. मुझे वापस भारत जाना है. मैं यहां भूखा रहकर दिन-दिन भर पेड़ काटता हूं या खजूर तोड़ता हूं. वहां (भारत में) मैं आम के पेड़ पर भी नहीं चढ़ पाता था और यहां खजूर के सीध्े पेड़ पर चढ़ना पड़ता है. शुरू के कुछ दिन तक तो मैंने हाजियों से बतौर टिप मिलने वाली एक रोटी प्रतिदिन पर गुजारा किया है. एजेंट ने 15 से 20 हजार रुपए तक मासिक वेतन का आश्वासन दिया था, परन्तु दुष्ट एंप्लॉयर ने अभी तक कुछ नहीं दिया गया है, बेगारी कराता है. पासपोर्ट भी जब्त कर लिया है. मैंने कोशिश की कि मेरा पासपोर्ट मुझे वापस मिल जाए लेकिन जब भी पासपोर्ट मांगता हूं, मारता-पीटता है और फिर सजा के तौर पर 14 से 15 घंटे तक काम लेता है. एशिया से, विशेष रूप से भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश से, वहां पहुंचने वाले हजारों लोग जानवरों की तरह खरीदे-बेचे जाते हैं. पासपोर्ट जब्त कर लिए जाने के कारण बिना पासपोर्ट के वे असहाय हैं. परवेज भाई की रामकहानी सुनकर मेरे मन ने कहा- श्याम, दूर के ढोल सुहावने होते हैं. हमें लगता है कि फलां व्यक्ति विदेश कमाने गया, पैसा भेजता है. किसी ने यह नहीं सोचा कि वह वहां कैसे रहता होगा, क्या खाता होगा. परवेज भाई के अनुभव ने मन विचलित कर दिया.

परवेज भाई की बातों में हम इतने तल्लीन हो गए कि पता ही नहीं चला कि कब कैम्पियरगंज आ गया. कैम्पियरगंज माननीय श्री फतेहबहादुर सिंह जी का विधानसभा क्षेत्र है, जो कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरबहादुर सिंह जी के सुपुत्र हैं. फतेहबहादुर सिंह जी की धर्मपत्नी श्रीमती साधना सिंह जी हमारे गोरखपुर जिला पंचायत की अध्यक्ष हैं. हाल ही में उन्होंने भाजपा ज्वाइन किया है. कैम्पियरगंज गोरखपुर का विकसित विधानसभा क्षेत्र है. यहां की पक्की सड़कें, बिजली आपूर्ति, पेयजल व्यवस्था इसकी समृद्धि का प्रतीक है. कैम्पियरगंज से दक्षिण करीब 15 किमी की दूरी पर मेहदावल रोड पर सुनौरा गांव में हमारे मित्र विकास भाई की ससुराल है. हमारा पहला पड़ाव वहीं होना है और दुपहरिया भी वहीं छननी थी. खैर हम सुनौरा गांव पहुंचे. हमारी अगवानी के लिए स्वयं विकास भाई के बड़े साले साहब बाबू मार्कण्डेय सिंह जी मौजूद थे. बाबू मार्कण्डेय सिंह रौब-दाब व्यक्तित्व वाले दिखे. साथ ही वह बड़े हंसमुख भी थे. दो-तीन घंटे कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला. चाय-नाश्ते का दौर चला. हम मित्रों ने गांव का थोड़ा चक्कर मारने का विचार किया. गांव घूमने पर हमें महसूस हुआ कि यह एक विकसित गांव है. इस गांव में हिंदी-अंग्रेजी माध्यम के दो इंटर कालेज, एक महाविद्यालय तथा क्षेत्र के युवाओं को व्यवसायिक प्रशिक्षण देने के लिए एक आईटीआई भी है. महाविद्यालय में सभी विषय पढ़ाए जाते हैं. एक इंटर कालेज तो बाबू मार्कण्डेय सिंह का स्वयं का है. इनका एक ईंटभट्टा भी चलता है. कुल मिलाकर पैसे वाले व्यक्ति हैं बाबू मार्कण्डेय सिंह जी. अपनी पारंपरिक क्षत्रिय शानोशौकत को निभाते हुए उन्होंने हमारी आवभगत के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. हमने भी छककर ससुराल का माल काटा. हमारे मित्र की ससुराल तो हमारी ससुराल. खाते-पीते दोपहर के दो बज गए. हम लोगों ने ससुराल में ज्यादा देर तक रूकना उचित नहीं समझा. क्योंकि जितनी देर हम वहां रहेंगे, मार्कण्डेय बाबू अपना सारा जरूरी काम-काज छोड़कर हमारी आवभगत में ही लगे रहेंगे.

इस समय दोपहर के दो बज रहे थे. अभी भी हम लोगों के पास काफी समय बचा था. गोरखपुर से बारात को शाम चार बजे निकलना था. अब क्या किया जाए. इसी उधेड़बुन थे कि राजकुमार भाई ने ही सुझाया कि बृजमनगंज के रास्ते में ही लेहड़ा माई का दरबार पड़ता है. क्यों न वहां भी हो लिया जाए. लेहड़ा माई मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यह मंदिर ईसा पूर्व छठीं शताब्दी से ही जन आस्था का केन्द्र रहा है. गौतम बुद्ध के जन्म के समय (लगभग 563 ईसा पूर्व) से ही इस मंदिर के संबंध में पौराणिक व ऐतिहासिक संदर्भ मिलने लगे थे. उस समय के कोलिय गणराज्य के अधीन आने वाला यह क्षेत्र पुरातात्विक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है. उपलब्ध बौद्ध साक्ष्यों के अनुसार गौतम बुद्ध की माता माया देवी कोलिय गणराज्य की कन्या थीं. ऐसे में बुद्ध का बाल्यकाल इन्हीं क्षेत्रों में व्यतीत हुआ. फरेन्दा तहसील मुख्यालय से महज आठ किमी की दूरी पर स्थित लेहड़ा देवी के संबंध में कई किवदंतियां प्रचलित हैं. पौराणिक संदर्भों के अनुसार इस मंदिर की स्थापना पांडवों ने अज्ञातवास के समय की थी. मान्यता के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने इसी स्थान पर यक्ष के प्रश्नों का सही उत्तर देकर अपने चारों भाइयों को पुनर्जीवित किया था. बाद में पांचों भाइयों ने यहां पीठ की स्थापना कर पूजा अर्चना प्रारम्भ की. ऐतिहासिक तथ्यों पर गौर करें तो चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपने यात्रा वृत्तांत में इस देवी स्थल का उल्लेख किया है. वासंतिक व शारदीय नवरात्र में यहां आस्था का सैलाब उमड़ता है. हम सबने भी माता जी की पवित्र भूमि पर कुछ पल बिताए. स्मृतिस्वरूप हमने कुछ फोटो खींचे और खिचवाए. शाम के चार बजे तक हम माता के दरबार में रहे. उसके पश्चात हम फिर अपने गंतव्य बृजमनगंज की ओर निकल पड़े.

बृजमनगंज वहां से लगभग 14 किमी दूरी पर है. रास्ते भर हरे-भरे खेत-खलियान, गांव देखते-देखते हम साढ़े चार- पौने पांच के करीब बृजमनगंज कस्बे में प्रवेश कर गए. समस्या थी ठहरा कहां जाए. सोचा गया कि चलो बृजमनगंज स्टेशन ही हो आया जाए, वहीं फ्रेश भी हो लिया जाएगा. परवेज भाई ने गाड़ी स्टेशन के समीप पार्क की. हम सभी स्टेशन मास्टर से मिले और उनको अपना परिचय दिया. हम सभी मुख्यालय के वरिष्ठ रेल कर्मचारी हैं, यह जानकर उन्होंने हमारा स्वागत करते हुए हमें वेटिंगरूम में रूकने के लिए कहा. छोटा स्टेशन होने के कारण वेटिंगरूम प्रायः बंद ही रहता था. इसलिए उसमें सीलनभरी अजीब सी दुर्गंध आ रही थी. हम सबने वेटिंगरूम की जगह प्लेटफार्म पर ही टहलकर समय काटना उचित समझा. छोटा स्टेशन होने के नाते यहां केवल पैसेंजर गाड़ियों का ही ठहराव रहता है.


सवा पांच बजे के करीब हम सबने कन्यापक्ष के घर की ओर प्रस्थान किया. हमें जनवासे में ले जाया गया. बारात से पहुंचने वाले हम पांच पहले बराती थे. आवभगत हुई. निश्चित समय पर बारात आई और गाजे-बाजे के साथ हम कन्यापक्ष के घर की ओर चल पड़े. द्वार पूजा हुआ, अन्य वैवाहिक कार्यक्रम हुए. हम सब खा-पीकर पुनः घर वापसी के लिए परवेज भाई के हवाले हो गए. लौटते समय रास्ते में काफी कोहरा मिला. पर परवेज भाई दक्ष ड्राइवर हैं, आखिर हों भी क्यों न, सऊदी अरब रिटर्न जो हैं. हंसते-गाते अगली यात्रा की प्लानिंग करते हुए साढ़े बारह- एक बजे के करीब हम घर वापस आ गए. आज भी हमें बृजमनगंज यात्रा की एक-एक घटना याद आती हैं तो मित्रमंडली सहित किसी अन्य यात्रा पर जाने का मन लालायित हो उठता है.
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