Thursday, August 25, 2016

समस्या प्रबंधन

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामना...

आज हम समस्या प्रबंधन पर बात करते हैं। कृष्ण से बड़ा समस्या प्रबंधक कौन होगा? आप जानते हैं कि समस्या जीवन की सच्चाई हैं। संसार का कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं होगा जिसने अपने जीवन में कभी किसी समस्या का सामना नहीं किया हो। तो फिर आखिर समस्या से घबराना क्यों? यह बात सभी को मालूम है कि जिस प्रकार से कोई ताला बगैर चाबी के नहीं बनाया जाता उसी प्रकार से ईश्वर ने कोई भी समस्या बगैर उसके समाधान के नहीं बनाया है। और यह भी सही है कि यदि किसी समस्या को सुलझाया जा सकता है तो फिर चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है और यदि किसी समस्या को सुलझाया नहीं जा सकता तो फिर चिंता करने से क्या लाभ है? यानी किसी भी परिस्थिति में चिंता करने की कोई जरूरत ही नहीं है। उसका समाधान अवश्य है, सिर्फ उसे ढूंढने की आवश्यकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात कि किसी भी समस्या को बड़ा न होने दें, उसका समाधान ढूंढे और सामना करें, तो आप पाएंगे कि समस्या छोटी होती गई और अंततः समाप्त हो गई।

आइए, इस संबंध में कृष्ण की एक कहानी के माध्यम से आपको समस्या प्रबंधन का गुर बताने का प्रयास करता हूं- एक बार श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई श्रीबलराम के साथ जंगल में किसी काम से गए थे। चलते-चलते काफी दूर निकल जाने के बाद शाम हो गई। श्रीकृष्ण ने भईया से कहा अब वापस चलते हैं। वापस लौटने में रात हो गई। अमावस्या की रात थी। हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। श्रीकृष्ण ने कहा कि आज रात यहीं कहीं बिताया गया। तय हुआ कि एक बड़े पीपल के पेड़ के नीचे रूका जाए। श्रीकृष्ण ने कहा कि भईया घना वन है, जंगली पशुओं का खतरा है, हम बारी-बारी से पहरा देंगे। पहले आप सो जाइए, मैं पहरा दूंगा। जब मुझे नींद आएगी तो जगा लूंगा। बलरामजी बड़े भाई होने के नाते बोले- नहीं, पहले तुम सो जाओ, जब मुझे नींद आएगी तो जगा लूंगा। परस्पर सहमति बनी। श्रीकृष्णजी सो गए। रात और गहराई। बलरामजी जी जग रहे थे। इतने में उसी पीपल के पेड़ से एक भयंकर दानव उतरा और भयानक आवाज निकालने लगा। चूंकि बलरामजी बलवान योद्धा थे, डरे नहीं। फिर दानव ने भयंकर आवाज में दहाड़ मारी उससे बलरामजी थोड़ा सहम गए। उसी समय एक अप्रत्याशित घटना घटी। बलरामजी के सहम जाने से दानव का शरीर बड़ा हो गया और बलरामजी का कद छोटा हो गया। अब तो दानव और जोर-जोर से दहाड़ने लगा। बलरामजी भयभीत होने लगे। इससे उनका कद शनै-शनै छोटा होता गया और दानव का शरीर उसी अनुपात में बड़ा होता गया। इधर श्रीकृष्ण जी मानो घोड़े बेचकर सो रहे थे या उनकी माया थी। बलरामजी को मूर्छा आने लगी, उन्होंने किसी तरह कृष्ण को हिला-डुलाकर जगाया और स्वयं मूर्छित होकर गिर पड़े। श्रीकृष्ण जी नींद से जागे तो देखा कि बलराम जी गिरे पड़े हैं। उन्होंने सोचा कि शायद बलराम जी को नींद आ रही थी इसीलिए मुझे जगाकर सो गए हैं।
श्रीकृष्ण जी अब पहरे पर लग गए। कुछ समय पश्चात पुनः वही दानव फिर प्रकट हुआ और श्रीकृष्ण को डराने के उद्देश्य से दहाड़ लगाने लगा। श्रीकृष्ण बिना भयभीत हुए मुस्कराने लगे। अब तो दानव और जोर-जोर से दहाड़ने लगा। वह जितना दहाड़ता, क्रोध करता, उतना श्रीकृष्ण शांत चित्त से मुस्कराते। इससे दानव का शरीर छोटा होता गया, एक समय वह इतना छोटा हो गया कि श्रीकृष्ण ने उसे अपनी धोती में ही खोंस लिया।
सुबह चिड़ियों के चहचहाने की आवाज सुनकर बलराम जी की आंख खुली। सूर्य की किरणें छन-छनकर घने वन को आलोकित कर रही थी। आंख मलते हुए बलराम जी ने रात की घटना श्रीकृष्ण को बयान की। श्रीकृष्ण ने बलराम को अपनी धोती में बंधे दानव को दिखाते हुए कहा कि क्या यही वह दानव है? जिससे आप भयभीत हो गए थे। बलरामजी ने देखा कि यह तो वही दानव है परन्तु यह इतना छोटा कैसे हो गया। श्रीकृष्ण से कारण पूछने पर उन्होंने कहा कि हां, यही वह दानव है। जिससे आप भयभीत हो गए थे। आप जिससे भयभीत हो जाएंगे वह आपको डराता जाएगा, उसका कद बड़ा होता जाएगा। जहां आपने उसका सामना किया और आप भयभीत नहीं हुए, उसका कद अपने आप छोटा होता जाएगा। यही प्रकृति का नियम है।
सीख- किसी भी समस्या का समाधान करने के लिए सबसे पहले आपका चित्त शांत होना चाहिए। क्रोध में आकर या भयभीत होकर किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। साथ ही हम यह भी जानते हैं कि दुनिया की ऐसी कोई समस्या नहीं है, जिसका समाधान उपलब्ध न हो, हमें सिर्फ उसे तलाशने आवश्यकता है।
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