Wednesday, August 3, 2016

दरकते रिश्ते


सच! कितना अपनापन और आत्मिक स्नेह था उस दौर में! जब हमारी चिंता हमारी न होकर पूरे परिवार की बन जाती थी और हम सब मिलकर सहयोग से उसको दूर करने का प्रयास करते थे। उस समय में रिश्तों में कितना अपनापन था और हम रिश्ते को निभाते थे ढोते नहीं थे।
उस समय में हम रिश्तों को बोझ नहीं समझते थे बल्कि रिश्तों की जरूरत समझते थे और ऐसा मानते थे कि रिश्तों के बिना जीवन जीया ही नहीं जा सकता। लेकिन आज इस बदलते दौर ने और आपाधापी के समय ने इस सारी व्यवस्था को बदलकर रख दिया है। अब वह दौर नहीं रहा। आज हमारे परिवार छोटे हो गए हैं और हम सब लोग स्वकेंद्रित होकर जी रहे हैं। पहले हम पूरे परिवार के लिए जीते थे, पर आज सिर्फ अपने-अपने बीवी-बच्चों के लिए ही जीते हैं। वही हमारा परिवार बन कर रह गया है। हमें अपनी अपनी बीवी-बच्चों के अलावा किसी और का सुख और दुख नजर नहीं आता। हम अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ इसी उधेड़बुन में लगा देते हैं कि कैसे अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं दें और कैसे अपने आपको समाज में प्रतिष्ठित बनाएं।

आपाधापी के इस दौर में जीवन से संघर्ष करते हुए हम आज रिश्तों को भूल गए हैं। आज हमारे बच्चों को अपने ताऊ, चाचा, बुआ, मामा, मौसी के लड़के-लड़की अपने भाई-बहन नहीं लगते। उन्हें इन रिश्तों की मिठास और प्यार का अहसास ही नहीं हो पाता है, क्योंकि कभी उन्होंने इन रिश्तों की गर्माहट को महसूस किया ही नहीं।
 
हम यह क्यों भूल जाते हैं कि पहले जब हम संयुक्त परिवार में रहते थे तो घर-द्वार की सारी चिन्ता छोड़कर हफ्तों-महीनों सैर-सपाटे पर निकल जाते थे और आज हम जब से एकल परिवार वाले हुए हैं, एक दिन के लिए भी घर छोड़कर जाने के लिए महीनों माथापच्ची करते हैं। 

कल को हमारे ये बच्चे भी हमें और अपने भाई-बहनों को पराया समझेंगे और इन रिश्तों को बोझ ही समझेंगे, क्योंकि किसी ने यह सही कहा है कि जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे.



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