Tuesday, September 13, 2016

हिंदी दिवस

मित्रों ! कल हिंदी दिवस हैं। कुछ संकल्प लेने-लिवाने का दिवस है। क्या ही अच्छा हो कि शुरूआत हम स्वयं से करें। जब हम स्वयं शुरूआत करेंगे तभी तो हम किसी दूसरे को कह सकते हैं। बहुत ही छोटे, पर महत्वपूर्ण, चीज पर आपका ध्यान आकृष्ट करता हूं, जिसे आप बेझिझक अपना सकते हैं, वह है सोशल मीडिया, यानी फेसबुक, व्हाट्सऐप, लिंक्डइन आदि में अपना प्रोफाइल नाम हिंदी (देवनागरी) में रखना।

फेसबुक, व्हाट्सऐप, लिंक्डइन आदि में मैंने अपना नाम तो हिंदी (देवनागरी) में लिख दिया है. आप कब शुरूआत करेंगे?

मित्रों ! हम बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं कि फलां होना चाहिए, डिकां होना चाहिए। पर छोटी-छोटी बातों को हम नजरंदाज कर देते हैं, जबकि वही महत्वपूर्ण होती है।

कल का इंतजार क्यों कर रहे हैं, आज ही, बल्कि मैं तो कहूं अभी अपने प्रोफाइल नाम को हिंदी (देवनागरी) कर दें. तभी कुछ सार्थक है. वर्ना बड़े-बड़े हिंदी के नामचीन समर्थक लोगों (जिन्होंने फेसबुक आदि पर अभी तक अपना प्रोफाइल नाम तक हिंदी में नही किया है) की तरह आप भी सबको हिंदी दिवस की बधाई देते रहिएगा, कौन क्या बिगाड़ लेगा।

Monday, September 12, 2016

औरत ही औरत की दुश्मन

जमाना बदल गया है, हम आधुनिक युग में जी रहे हैं। आज लड़की और लड़के में फर्क न के बराबर हो गया है। लड़कियों को भी अपने भाइयों के समान ही समान अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लड़कियां लड़कों से बाजी मार रही हैं। हर मोर्चे पर लड़कियों ने बुलंदी के झंडे गाड़ दिए हैं। फिर क्यों लड़कियों को कमजोर, अबला या निरीह समझा जा रहा है। ऐसी सोच किसकी है?
 
भारतीय समाज प्रारंभ से ही पितृसत्तात्मक सोच वाला रहा है। यहां वर्षों से पुरूषों का वर्चस्व रहा है। एक लड़की का बचपन पिता-भाई की छत्रछाया में, फिर विवाहोपरांत पति और बुढ़ापा पुत्र की छाया में रहता आया है। यह सोच क्या मात्र पुरूषों की थीनहीं! कहीं न कहीं इस सोच में परिवार या समाज की स्त्रियों का भी समर्थन प्राप्त था। इसमें कोई दो राय नहीं कि स्त्रियों ने परोक्ष रूप से पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बनाए रखने में अपना भरपूर समर्थन दिया था, बल्कि कहा जाए तो आज भी यही व्यवस्था लागू कर रखी है। ऐसा नहीं है कि ऐसी सोच सिर्फ गांव-देहात में विद्यमान है, बल्कि शहरी क्षेत्र में पॉश कालोनियों में रहने वाले हमारे पढ़े-लिखे कथित सभ्य समाज में भी ऐसी सोच देखी गई है। और तो और ये सोच महिलाओं में ही ज्यादा देखी गई है। औरत ही औरत की दुश्मन है- यह कहावत सच साबित होती है।

घर में बेटी के जन्म पर सबसे ज्यादा दुःखी होने वाला शख्स कौन? क्या दादा? क्या पिता? नहीं ! दुःखी होती है दादी, दुःखी होती है जन्म देने वाली मां। हम लाख प्रचार-प्रसार करा दें, स्लोगन छपवा दें- बेटी बचाओ- समाज बचाओ, जागो औरत जागो आदि, आदि। परन्तु हम सोच को कैसे बदलेंगे। सास-बहू, ननद-भाभी के रिश्ते जगजाहिर हैं। कभी ससुर-बहू या देवर-भाभी की वैमनस्यता देखी है?  नहीं ! देखा जाए तो एक औरत ही औरत की दुश्मन बनी हुई है। कभी सास के रूप में बहू को रात-दिन कोसना तो कभी बहू के रूप में पति की अनुपस्थिति में सास को गालियां देना, मारना-पीटना। यह हमें अक्सर दैनिक समाचार-पत्रों या टेलीविजन पर समाचार के माध्यम से देखने को मिल जाता है।

अभी हाल ही में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई, जब एक पढ़ी-लिखी सभ्रांत मां ने अपनी चार माह की अबोध बच्ची को चाकुओं से गोदकर सिर्फ इसलिए मार डाला, क्योंकि वह बेटी थी। जबकि उसके परिवार के पुरूष वर्ग को बेटी पैदा होने पर न तो अफसोस था और न ही कोई गिला-शिकवा। यह किस तरह की मानसिकता को दर्शाता है। उस अबोध बच्ची का क्या कसूर था? क्या यह कि वह लड़की थी? वह हत्यारी मां क्या किसी की बेटी नहीं रही थी? क्या उसने बेटी होकर भी उच्च शिक्षा-दीक्षा प्राप्त नहीं की थी? बेटे की चाह ने क्या उसे इस कदर अंधा बना दिया था कि उस मासूम की निर्मल मुस्कान उसे नहीं दिखी?


क्या सच में एक औरत ही औरत की दुश्मन होती है?

Saturday, September 10, 2016

धारा 370 मुक्त हो कश्मीर हमारा

मोदी जी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान धारा 370 का मसला व्यापक राष्ट्रीय हित में उठाया था, लेकिन उस पर अभी तक अमल नहीं हो पाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीर में धारा 370 हटाने के बाद राज्य की अधिकांश आबादी का विकास ही होगा जो अब तक मुख्यधारा से कटी हुई है।  
दरअसल, धारा 370 को लागू करते समय तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी ने देश को भरोसा दिलाया था कि यह व्यवस्था अस्थायी रहेगी, जो समय के साथ धीरे-धीरे स्वतः समाप्त हो जाएगी, लेकिन यह तो अब लगता है कि स्थायी हो गई है। अब तक किसी भी सरकार ने इसे हटाने का प्रयास करना तो दूर, सोचा तक नहीं।

तत्कालीन कानून मंत्री डॉ. भीमराव अम्बेडकर कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने शेख़ अब्दुल्ला को लताड़ते हुए साफ़ शब्दों में कह दिया था, "आप चाहते हैं, भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे, वह आपके यहां सड़कें बनाए, आपको राशन दे और कश्मीर का वही दर्ज़ा हो जो भारत का है! लेकिन भारत के पास सीमित अधिकार हों और जनता का कश्मीर पर कोई अधिकार नहीं हो। ऐसे प्रस्ताव को मंज़ूरी देना देश के हितों से दग़ाबाज़ी करने जैसा है और मैं क़ानून मंत्री होते हुए ऐसा कभी नहीं करूंगा।" 

यह नेहरू जी की पहल का परिणाम था कि कश्मीर को धारा 370 के अंतर्गत रखा गया। इस प्रावधान का डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने पुरज़ोर विरोध किया था। मुखर्जी ने नेहरू से कहा था कि आप जो करने जा रहे हैं, वह नासूर बन जाएगा और किसी दिन देश को विखंडित कर देगा। यह प्रावधान उन लोगों को मज़बूत करेगा, जो कहते कि भारत एक देश नहीं, बल्कि कई राष्ट्रों का समूह है।


आज घाटी में जो हालात हैं, उन्हें देखकर लगता है कि मुखर्जी की आशंका ग़लत नहीं थीधारा 370 के कारण ही राज्य मुख्यधारा से जुडऩे की बजाय अलगाववाद की ओर मुड़ गया। यानी जहां तिरंगे का अपमान होता है, बच्चों के हाथों में किताबों की जगह पत्थर पकड़ाए जाते हैं, देशविरोधी नारे लगाए जाते हैं, भारतीय सैनिकों की मौत की कामना की जाती है। इस धारा 370 का ही दुष्परिणाम है कि इस देश के अंदर ही कश्मीर एक मिनी पाकिस्तान बन गया है।


अब समय आ गया है कि इस धारा को हटाया जाए। अगर वाक़ई कश्मीर समस्या सदा के लिए हल करना है तो भारतीय संसद को ज़बरदस्ती इस धारा 370 को कूड़ेदान में डाल ही देना चाहिए। इसके लिए सरकार और विपक्ष में बैठे सभी लोगों को मिलकर करना होगा। यह बात कश्मीर के तथाकथित आकाओं को भी मालूम है कि पहले तो वे भारत से आजाद हो ही नहीं सकते, और यदि हो भी गए तो आजाद होकर सुखी नहीं रह सकते। यह उन्होंने पिछली बाढ़ से समय पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर की हालात को देखा ही है। अलगाववादी और दूसरे नेता यह अच्छी तरह से जानते हैं कि कश्मीर भारत से अलग नहीं हो सकता। लिहाज़ा, अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए आज़ादी का राग आलापते रहते हैं। भारत देश के पैसे पर पल रहे ये लोग, मलाई काट रहे हैं। अब समय आ गया है कि इनको मलाई खिलाना बंद किया जाए और उन्हें उनकी औकात में रहना सिखाया जाए। यह कार्य यदि मोदी सरकार में नहीं हुआ तो समझो कभी नहीं हो पाएगा।