Monday, September 12, 2016

औरत ही औरत की दुश्मन

जमाना बदल गया है, हम आधुनिक युग में जी रहे हैं। आज लड़की और लड़के में फर्क न के बराबर हो गया है। लड़कियों को भी अपने भाइयों के समान ही समान अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लड़कियां लड़कों से बाजी मार रही हैं। हर मोर्चे पर लड़कियों ने बुलंदी के झंडे गाड़ दिए हैं। फिर क्यों लड़कियों को कमजोर, अबला या निरीह समझा जा रहा है। ऐसी सोच किसकी है?
 
भारतीय समाज प्रारंभ से ही पितृसत्तात्मक सोच वाला रहा है। यहां वर्षों से पुरूषों का वर्चस्व रहा है। एक लड़की का बचपन पिता-भाई की छत्रछाया में, फिर विवाहोपरांत पति और बुढ़ापा पुत्र की छाया में रहता आया है। यह सोच क्या मात्र पुरूषों की थीनहीं! कहीं न कहीं इस सोच में परिवार या समाज की स्त्रियों का भी समर्थन प्राप्त था। इसमें कोई दो राय नहीं कि स्त्रियों ने परोक्ष रूप से पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बनाए रखने में अपना भरपूर समर्थन दिया था, बल्कि कहा जाए तो आज भी यही व्यवस्था लागू कर रखी है। ऐसा नहीं है कि ऐसी सोच सिर्फ गांव-देहात में विद्यमान है, बल्कि शहरी क्षेत्र में पॉश कालोनियों में रहने वाले हमारे पढ़े-लिखे कथित सभ्य समाज में भी ऐसी सोच देखी गई है। और तो और ये सोच महिलाओं में ही ज्यादा देखी गई है। औरत ही औरत की दुश्मन है- यह कहावत सच साबित होती है।

घर में बेटी के जन्म पर सबसे ज्यादा दुःखी होने वाला शख्स कौन? क्या दादा? क्या पिता? नहीं ! दुःखी होती है दादी, दुःखी होती है जन्म देने वाली मां। हम लाख प्रचार-प्रसार करा दें, स्लोगन छपवा दें- बेटी बचाओ- समाज बचाओ, जागो औरत जागो आदि, आदि। परन्तु हम सोच को कैसे बदलेंगे। सास-बहू, ननद-भाभी के रिश्ते जगजाहिर हैं। कभी ससुर-बहू या देवर-भाभी की वैमनस्यता देखी है?  नहीं ! देखा जाए तो एक औरत ही औरत की दुश्मन बनी हुई है। कभी सास के रूप में बहू को रात-दिन कोसना तो कभी बहू के रूप में पति की अनुपस्थिति में सास को गालियां देना, मारना-पीटना। यह हमें अक्सर दैनिक समाचार-पत्रों या टेलीविजन पर समाचार के माध्यम से देखने को मिल जाता है।

अभी हाल ही में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई, जब एक पढ़ी-लिखी सभ्रांत मां ने अपनी चार माह की अबोध बच्ची को चाकुओं से गोदकर सिर्फ इसलिए मार डाला, क्योंकि वह बेटी थी। जबकि उसके परिवार के पुरूष वर्ग को बेटी पैदा होने पर न तो अफसोस था और न ही कोई गिला-शिकवा। यह किस तरह की मानसिकता को दर्शाता है। उस अबोध बच्ची का क्या कसूर था? क्या यह कि वह लड़की थी? वह हत्यारी मां क्या किसी की बेटी नहीं रही थी? क्या उसने बेटी होकर भी उच्च शिक्षा-दीक्षा प्राप्त नहीं की थी? बेटे की चाह ने क्या उसे इस कदर अंधा बना दिया था कि उस मासूम की निर्मल मुस्कान उसे नहीं दिखी?


क्या सच में एक औरत ही औरत की दुश्मन होती है?
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