Monday, February 13, 2017

मैनेजमेंट गुरू हनुमान

हनुमानजी एक श्रेष्ठ भक्त होने के साथ-साथ एक अच्छे शिक्षक भी रहे हैं। उनकी दूरदर्शितापूर्ण शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं, जिनका अनुसरण कर लोग जीवन में सफलता हासिल कर सकते हैं। बल, बुद्धि, विद्या के गूढ़ ज्ञाता पवन पुत्र हनुमान हर विधा में पारंगत थे, उनकी प्रत्येक लीला, कार्य में कोई न कोई शिक्षाप्रद बात छिपी रहती थी। ज्ञानवान, बुद्धिमान, गुणवान होने के बावजूद वे राम के आदेशों के अनुरूप काम करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति के लिए ज्ञान मिलने के बाद विनम्रता की सीख देने वाला गुण है। 
सीता की खोज में सबसे आगे रहने, लंका में दूत की तरह पेश आने, सीता को राम के आगमन का भरोसा दिलाने, पाताल से राम और लक्ष्मण को वापस लाने तथा संजीवनी बूटी के लिए पर्वत उठा लाने जैसे काम न केवल हनुमान की सूझ-बूझ का परिचय देते हैं बल्कि किसी काम को करने में आ रही बाधाओं को पार पाने का रास्ता भी बताते हैं। 

संबंधों की शिक्षा 
हनुमान जी ने बताया कि जीने की राह, जरा सी गलतफहमी जीवनभर के संबंधों को सदा के लिए खराब कर देती है। लोगों के बीच संघर्षपूर्ण स्थिति में भी संबंध मधुर बने रहें ऐसा प्रयास भी एक बड़ी सेवा है। सुंदरकांड में सीता-हनुमानजी की बड़ी सुंदर बातचीत बताई है। जिसमें दुखी सीताजी ने हनुमानजी के सामने श्रीरामजी की शिकायत करते हुए कहा था कि श्रीराम क्या कभी मेरी भी याद करते हैं। 
तब हनुमानजी ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए दावा कर दिया कि श्रीराम के ह्रïदय में आप से ज्यादा प्रेम है। परंतु आपके दु:ख से दुखी हैं। विचार की यह अति प्रस्तुति सीता-राम के बीच गलतफहमी दूर करने की भूमिका ही थी। आज के अशांत समाज में इसी भूमिका की आवश्यकता है।


व्यक्तित्व रस मिटाता है विपत्तियां 
ज्योतिषाचार्य डॉ. सत्येन्द्र स्वरूप शास्त्री के अनुसार हमारे व्यक्तित्व में जिस बात का रस भरा होगा, उसके छींटे हमसे मिलने वालों पर गिरेंगे ही। लंका प्रवेश पर हनुमानजी व लंकनी का वार्तालाप उन्हें लंका प्रवेश के लिए एक विचार देती है। वह कहती है कि श्रीरघुनाथजी को हृदय में रखकर नगर में प्रवेश करते हुए सब काम कीजिए। 
विपत्तियों को छोटी मान लेना ही उन पर विजय जैसा है। इस विचार के चलते हनुमानजी ने दो कार्य किए पहला श्रीराम को हृदय में रखा और दूसरा प्रसन्न रहे। इसी कारण हनुमानजी की उपस्थिति मात्र से लंकनी के विचार भी दिव्य हो गए। अर्थात हम अपनी भीतरी स्थिति, शक्ति को जितना पुनीत रखेंगे, बाहर का वातावरण उतना ही शुभ होता चला जाएगा।


कर्मचारी को आत्मनिर्णय लेने की स्वतंत्रता 
आमतौर पर यह होता है कि दफ्तर के सारे निर्णय बॉस लेता है, कर्मचारी केवल उसकी प्लानिंग पर काम करते हैं। ऐसे में वे न तो कोई जिम्मेदारी लेते हैं और अगर काम नहीं हो रहा है या बिगड़ रहा है तो भी सलाह नहीं देते। अच्छा मैनेजर वह होता है जो अपने कर्मचारियों को काम के साथ निर्णय लेने की आजादी भी दे। तभी कर्मचारी ज्यादा जिम्मेदारी से काम करेंगे और निर्णय स्वतंत्रता के चलते परिणाम निश्चित ही अच्छे मिलेंगे। 
श्रीराम ने मैनेजर सुग्रीव पर सीताजी खोजने की जिम्मेदारी सौंपी और प्रत्येक निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र छोड़ा था। रावण के दरबार में हनुमान की पूंछ में आग लगाई गई तब एक अचछे कर्मचारी और निर्णय की आजादी के चलते उन्होंने स्थिति का संभाला एवं लंका दहन कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि सारे राक्षस श्रीराम के पहुंचने से पहले ही उनके पराक्रम का एक बड़ा झटका सह चुके थे।


कैरियर के लिए सुरक्षा जोन छोड़ें 
शिक्षा ग्रहण करने के बाद हमेशा सुरक्षा जोन से निकलकर अपने कैरियर की शुरुआत करनी चाहिए। इसके बाद ही असली सफलता का मजा आता है। हनुमानजी एक राजा के पुत्र थे, लेकिन इसके बाद भी उन्होंने सुग्रीव के सचिव के तौर पर अपना कैरियर शुरू किया। 
सचिव पद पर रहते हुए उन्होंने बड़े से बड़े कार्य आसानी से कर दिए और राम के ह्रïदय में ऐसी जगह बनाई जो कभी हट नहीं सकती। अर्थात्ï ऐसे कर्मचारी बनें जो मालिक पर उपकार करे और सदैव उसका प्रिय बना रहे। हनुमानजी की तरह मनुष्य को अपने विद्वता का इस्तेमाल समय-समय पर करते रहना चाहिए। हनुमानजी की तरह शिक्षा हमें त्याग करना सिखाती है।

दूने की होड़ का नतीजा असफलता 
जब हनुमान जी लंका की ओर जा रहे थे तब सुरसा राक्षसी ने उन्हें खाने की चेष्टा की। इस पर हनुमान जी ने अपना स्वरूप विकराल कर लिया, उनकी देखा-सीखी सुरसा भी विकराल रूप में आ गई। तभी हनुमान जी ने अत्यंत सूक्ष्म रूप में आकर उसके मुख के अंदर गए और तत्काल बाहर आ गए। तब उन्होंने इस लीला से यह शिक्षा दी कि किसी को आगे बढ़ते देख उससे दूने बनने की होड़ में मनुष्य कभी भी सफलता हासिल नहीं कर सकता। दूने की होड़ में सदैव असफलता ही हाथ लगेगी। अर्थात अपने आप को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने में मनुष्य कभी सफल नहीं होता। लघु होकर भी मनुष्य अपने कार्य में सफल हो सकता है।
Post a Comment