Saturday, April 15, 2017

महापुरूषों की जयंतियों पर दी जाने वाली छुट्टी

सरकारी दफ्तरों में महापुरूषों की जयंती आदि पर दी जाने वाली छुट्टियों के पीछे आखिर पिछली सरकारों और वर्तमान की केन्द्र सरकारों की मंशा क्या थी और है.

क्या इन अवसरों पर दी जाने वाली छुट्टियों से सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के मन में उन महापुरूषों के प्रति  श्रद्धा बढ़ेगी या उनके आदर्शों पर चलने के प्रति ललक बढ़ेगी?

खरी बात तो यह है कि इन महापुरूषों की जयंतियों पर मिलने वाली छुट्टियों से हमारे मन में न तो उनके प्रति कोई अतिरिक्त श्रद्धा उत्पन्न होती है और न ही हमको उनके आदर्शों पर चलने के प्रति कोई अतिरिक्त प्रेरणा ही मिलती है. इसके विपरीत हम उस दिन आम दिन की अपेक्षा देर तक सोते हैं और पूरा दिन मौज-मस्ती में गुजार देते हैं. एक बार भी उस महापुरूष को याद नहीं करते. यह बात मेरे कुछ मित्रों को शायद नागवार लगेगी, परन्तु है यह पूर्णतः सत्य.

इन छुट्टियों से देश का कितना नुकसान हो रहा है, इसकी परवाह किसे है. राजनीतिक पार्टियां अपनी-अपनी रोटियां सेंक रही हैं और हम इन छुट्टियों को अपना मौलिक अधिकार समझ बैठे हैं.

सोच कर देखें. हम किसका भला कर रहे हैं, देश का या उन महापुरूषों का, जिन्होंने अपने खून-पसीने से इस देश को सींचा और हम उनके नाम पर पूरा दिन मौज-मस्ती में गुजार देते हैं.

अपने विचार से अवश्य अवगत कराइएगा.

खरी बात में बहस का मुद्दा सिर्फ यही है कि क्या  हम महापुरूषों की जयंतियों पर दी जाने वाली छुट्टियों का उपयोग उनके बारे में मनन-मंथन पर व्यतीत करते हैं या मौज मस्ती के रूप में???

यदि उस छुट्टी वाले दिन सिर्फ घंटे-दो-घंटे की कोई संगोष्ठी आयोजित करके उस महापुरूष के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर चर्चा-परिचर्चा की जाए और इसमें सभी की उपस्थिति अनिवार्य की जाए तो सही अर्थों में उस छुट्टी की महत्ता होगी.



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